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आचार संहिता लगते ही गिरा बीजेपी का ग्राफ़, अब अनुमान 50 सीटों पर सिमटा।

भोपाल । सरकारी पैसों से अपना चुनाव प्रचार कर रही बीजेपी या फिर यूँ कहें कि जनता के खून पसीने की कमाई से सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ने की कोशिश करती बीजेपी चुनावी आचार संहिता लगते ही शून्य नज़र आने लगी है। जनता के हज़ारों करोड़ रूपये बर्बाद कर अपना चुनाव प्रचार करने वाली बीजेपी की असलियत अब जनता के समझ में आ रही है। अब न कहीं कोई होर्डिंग है, न वॉल पेंटिंग न अख़बारों के पहले से लेकर आख़री पन्नों तक में शोर मचाते विज्ञापन। अब सिर्फ़ जनता है और उसके साथ खड़ी कांग्रेस पार्टी। *जो बीजेपी चुनाव की तारीख़ों के पहले 80 और 90 सीटों पर मज़बूत दिखने का दावा कर रही थी, वो अचानक से भरभराकर बिखरती और 50 से कम सीटों पर सिमटती नज़र आने लगी है। ओपिनियन पोल बेशक टीवी पर बीजेपी के मुक़ाबले कांग्रेस को केवल 20 सीटें अधिक दे रहे हों, पर ऑफ द रिकॉर्ड वो भी कांग्रेस को 160+ और वोट प्रतिशत में बीजेपी से लगभग 4% अधिक बता रहे हैं।* चुनाव की तारीख़ों के ऐलान के साथ ही मुख्यमंत्री शिवराज का एकांतवास में जाना भी उनकी जाती सत्ता को साबित कर रहा है। मध्यप्रदेश में चुनाव अब औपचारिकता मात्र नज़र आने लगा है। बीजेपी आत्मसमर्पण कर चुकी है। हर ओर एक ही बात है कि मध्यप्रदेश में बीजेपी अपने जीवनकाल की सबसे बड़ी पराजय देखने जा रही है। बीजेपी अब जीतने के लिये नहीं बल्कि हार के अंतर को कम करने के लिये चुनाव मैदान में है।* मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है जब चुनाव के दौरान बीजेपी के 60 से अधिक नेता बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गये हैं। ऐसा भी पहली बार हो रहा है जब उम्मीदवार नाउम्मीद और निराशा से भरे हैं। कैबिनेट मंत्री चुनाव लड़ने से इंकार कर रहे हैं, वहीं जिन्हें टिकट मिल गया है वो सार्वजनिक तौर पर कह रहे हैं कि मैं टिकट मिलने से खुश नहीं हैं। *गोदी मीडिया के इस दौर में भी हर चैनल, हर अख़बार से लेकर हर ज्योतिषाचार्य, हर राजनीतिक पंडित, हर सर्वे बीजेपी की करारी हार की भविष्यवाणी कर रहे हैं। देखना दिलचस्प होगा कि बीजेपी 50 का आँकड़ा छू पाती है या फिर आज जो मंत्रीमंडल की संख्या है, कल वही बीजेपी के सदस्यों की संख्या बचे। यही है जनता की ताकत।

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