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ग्राम गुर्जा में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिवस ध्रुव प्रह्लाद सती चरित्र प्रसंग का वर्णन किया।

मुरैना भगवताचार्य डां श्री सुरेश शास्त्री जी ने कहा- भगवान को सच्चे हृदय से याद करें उसी क्षण उसकी कृपा प्राप्त होना शुरू हो जाती है ग्राम गुर्जा में सात दिवसीय संगीतमय श्रीमद भागवत कथा का आयोजन चल रहा है। कथा के तीसरे दिन ध्रुव चरित्र, भक्त प्रह्लाद चरित्र और सती चरित्र कथा प्रसंग पर कथा सुनाई। कथा में पूज्य महाराज श्री ने कहा कि मनुष्य को दिखावा न करते हुए भगवान को सच्चे हृदय से याद करना चाहिए। उन्हाेंने कहा कि राजा उत्तानुपाद के दो पत्नियों में एक का नाम सुनीति और दूसरी का नाम सुरुचि था। सुरुचि के कहने पर उत्तानुपाद ने सुनीति को जंगल भेज दिया था। एक दिन सुनीति का पुत्र खेलते-खेलते राज दरबार जा पहुंचा और उत्तानुपाद की गोदी में बैठ गया। सुरुचि ने उसे फटकारते हुए गोद से उतार कर भगा दिया। इससे दुखी बालक ध्रुव जगंल में तपस्या करने लगा। *अलट भक्ति ने दिलाई अटल पदवी* भीषण बारिश और आंधी, तूफान भी उसे डिगा नहीं सके। नारद मुनि के समझाने पर भी ध्रुव ने तपस्या नहीं छोड़ी। कठिन तपस्या देख भगवान ध्रुव के सामने प्रकट हुए और उन्हें ब्रह्मांड में अटल पदवी दी। आज भी ध्रुव तारा अपने स्थान पर अटल रहते भगवान की भक्ति में ही शक्ति है पूज्य भगवताचार्य डॉ श्री सुरेश शास्त्री जी ने कहा कि भागवत कथा सही मार्ग दिखाता है, भक्ति करनी है तो ध्रुव और भक्त प्रहलाद जैसी करो। भगवान ने प्रहलाद के लिए अवतार लेकर हिरण्कश्यप का वध किया था। यदि भक्ति सच्ची हो तो ईश्वरीय शक्ति अवश्य सहायता करती है। उन्होंने कहा कि सभी अपने बच्चों को संस्कार अवश्य दें, जिससे वह बुढ़ापे में अपने माता पिता की सेवा कर सकें, गो सेवा, करे कथा में सती चरित्र पर भी प्रसंग सुनाया पूज्य महाराज श्री ने कहा माता सती के पिता दक्ष ने एक विशाल यज्ञ किया था और उसमें अपने सभी संबंधियों को बुलाया। लेकिन बेटी सती के पति भगवान शंकर को नहीं बुलाया। जब सती को यह पता चला तो उन्हें बड़ा दुख हुआ और उन्होंने भगवान शिव से उस यज्ञ में जाने की अनुमति मांगी। लेकिन भगवान शिव ने उन्हें यह कहकर मना कर दिया कि बिना बुलाए कहीं जाने से इंसान के सम्मान में कमी आती है। लेकिन माता सती नहीं मानी और राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में पहुंच गई। वहां पहुंचने पर सती ने अपने पिता सहित सभी को बुरा भला कहा और स्वयं को यज्ञ अग्नि में स्वाहा कर दिया। जब भगवान शिव को ये पता चला तो उन्होंने अपना तीसरा नेत्र खोलकर राजा दक्ष की समस्त नगरी तहस-नहस कर दी और सती का शव लेकर घूमते रहे। भगवन विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े-टुकड़े किए। जहां शरीर का टुकड़ा गिरा वहां-वहां शक्तिपीठ बनी। कथा में श्रद्धालुओं भक्तों का लगा तांता सर्दी होने पर भी लोग कथा में श्रौताओ की संख्या बढ़ती जा रही है

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