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गुरु और शिष्य का प्रेम संबंध ही संसार में सत्य है।

संसार में बहुत प्रकार के फूल है सबसे श्रेष्ठ फूल कमल का है। इसी प्रकार संसार में कई प्रेम है किंतु उत्तम प्रेम गुरु और शिष्य का है। जैसे मछली का प्रेम पानी से है, चकोर का चांद से है, पतंगे का शमा से है, पपीहे का स्वाति बूंद से है, चकवी का सूरज से है। सभी का प्रेम एक तरफा़ है जैसे मछली पानी के बिना नहीं रह सकती पर क्या पानी भी मछली से उतना ही प्रेम करता है। नहीं अगर ऐसा होता तो अब तक जितनी मछलियों का लोग भोजन बना चुके हैं उनके वियोग में संसार के सारे समुद्र सूख गए होते, पर ऐसा नहीं है। अगर चांद चकोर से सूरज चकवी से उतना ही प्रेम करता है, तो वह कभी छिपते नहीं। शमा पतंगे से प्रेम करती तो वह कभी पतंगे की जान नहीं लेती, क्योंकि प्रेम में जान नहीं ली जाती। इसी प्रकार आप संसार में भी किसी से प्रेम करते हैं तो वह प्रेम अधिकतर स्वार्थवश होता है। जब स्वार्थपूर्ण हो जाता है तो प्रेम भी खत्म हो जाता है। मोह एक ऐसा भंवर है जिसमें एक इंसान जब फंस जाता है तो फंसता ही चला जाता है। मोह में फंसकर इंसान का विवेक खत्म हो जाता है। दूसरी तरफ गुरु और शिष्य के प्रेम का पात्र ही नहीं संसार के लिए श्रद्धा का पात्र बन जाता है और इतिहास में उसका नाम अमर हो जाता है। संसार के मोह से ऊपर उठकर आध्यात्मिक प्रेम की ओर बढऩा चाहिए। जब आप अध्यात्म के पथ पर चलेंगे तो आप के दुख स्वत: सुख से परिवर्तन हो जाएंगे। और गुरु शिष्य को जब तक नहीं छोड़ता तब तक उसका इस नश्वर संसार में कल्याण नहीं करा देता

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