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विकास का ‘पोस्टमार्टम’: करोड़ों डकार गए विभाग, फिर भी बदहाली की मार झेल रहा मुरैना।

मुरैना जिला मुख्यालय आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहा रहा है। चंबल के इस द्वार पर विकास का सूरज उगने से पहले ही भ्रष्टाचार के बादलों ने उसे घेर लिया है। सरकारी दफ्तरों में फाइलों का वजन तो बढ़ रहा है, लेकिन धरातल पर आम आदमी का जीवन हल्का होता जा रहा है। शहर की वर्तमान स्थिति देखकर ऐसा लगता है जैसे यहां 'अंधेर नगरी, चौपट राजा' का खेल चल रहा है, जहां हर विभाग अपनी जिम्मेदारी दूसरे पर टालने में माहिर है। नगर निगम: स्वच्छता के नाम पर 'सफेद हाथी' नगर निगम ने स्वच्छता सर्वेक्षण की रैंकिंग सुधारने के लिए विज्ञापनों पर पानी की तरह पैसा बहाया, लेकिन हकीकत शहर की तंग गलियों और सड़ते कूड़े के ढेरों में देखी जा सकती है। नालियां जाम हैं, ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। जरा सी बारिश में मुरैना 'वेनिस' बन जाता है, जहां सड़कों पर नावें तो नहीं चलतीं, लेकिन कीचड़ का साम्राज्य जरूर खड़ा हो जाता है। करोड़ों के ठेके हुए, मशीनों की खरीद हुई, पर सवाल वही है—पैसा गया कहां? स्वास्थ्य विभाग: रेफरल सेंटर बनकर रह गया जिला अस्पताल स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर जिला अस्पताल सफेद बिल्डिंग के अलावा कुछ नहीं है। आधुनिक मशीनों पर धूल जम रही है या वे 'तकनीकी खराबी' का शिकार हैं। गरीब मरीज इलाज की उम्मीद में आता है, लेकिन उसे ग्वालियर या दिल्ली रेफर कर दिया जाता है। डॉक्टरों की कमी और कमीशनखोरी के खेल ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। स्वास्थ्य विभाग की संवेदनहीनता का आलम यह है कि सरकारी दवाओं के स्टॉक गायब हैं और मरीज बाहर की महंगी दवाएं खरीदने को मजबूर है। बिजली और पानी: दावों की रोशनी, हकीकत का अंधेरा बिजली विभाग की अघोषित कटौती और बिलों में धांधली ने उपभोक्ताओं का जीना मुहाल कर दिया है। 'स्मार्ट मीटर' के नाम पर जनता की जेबें काटी जा रही हैं। वहीं, 'नल-जल योजना' की पाइपलाइनें सड़कों को खोदकर छोड़ दी गई हैं। शहर की आधी आबादी आज भी शुद्ध पेयजल के लिए संघर्ष कर रही है, जबकि फाइलों में हर घर तक गंगा पहुंच चुकी है। शिक्षा और राजस्व: भ्रष्टाचार की नई पाठशाला शिक्षा विभाग में शिक्षकों की कमी और स्कूलों की जर्जर हालत भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। वहीं, राजस्व विभाग (कलेक्ट्रेट) में बिना 'ले-दे' के एक पत्ता भी नहीं हिलता। नामांतरण से लेकर सीमांकन तक, हर काम के लिए बाबू और दलालों का सिंडिकेट सक्रिय है। आम आदमी चप्पलें घिस देता है, पर उसका जायज काम भी फाइलों के नीचे दबा रहता है। निष्कर्ष: मुरैना की यह स्थिति किसी एक व्यक्ति या विभाग की नाकामी नहीं, बल्कि एक पूरे सिस्टम का पतन है। नेता चुनावी मोड में हैं और अधिकारी रिटायरमेंट मोड में। जनता की सुनने वाला कोई नहीं है। अगर समय रहते इन 'सफेदपोश' दीमकों पर लगाम नहीं कसी गई, तो मुरैना केवल अपराध और अव्यवस्था का पर्याय बनकर रह जाएगा। प्रशासन को अपनी कुंभकर्णी नींद छोड़नी होगी, वरना जनता का आक्रोश सड़कों पर उतरने में देर नहीं लगाएगा।

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