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मुरैना पुलिस की ‘सेलेक्टिव होली’: सच दिखाने वालों से दूरी, वाह-वाही करने वालों पर ‘रंग’ की बौछार!

मुरैना। लोकतंत्र में जब आईना धुंधला हो जाए तो तस्वीर साफ नहीं दिखती, लेकिन जब तस्वीर दिखाने वाले आईने को ही तोड़ दिया जाए, तो उसे तानाशाही की आहट कहा जाता है। मुरैना पुलिस के 'होली मिलन' कार्यक्रम में कुछ ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहाँ प्रशासन ने अपनी कमियाँ बताने वाले पत्रकारों के लिए दरवाजे बंद कर दिए। *चुनिंदा 'करीबियों' के बीच होली, सच से दूरी* इतिहास में शायद यह पहली बार हुआ है जब पुलिस विभाग के सरकारी होली मिलन समारोह में पत्रकारों की छंटनी की गई। एक तरफ उन लोगों को पलक-पावड़े बिछाकर बुलाया गया जो पुलिस की 'वाह-वाही' में माहिर हैं, वहीं दूसरी ओर उन पत्रकारों का रास्ता रोक दिया गया जो विभाग की कारगुजारियों को जनता के सामने बेबाकी से रखते हैं। *क्या इन 'कड़वे सच' से घबरा गया महकमा?* हालिया कुछ घटनाओं ने मुरैना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगे हैं, जिनका जवाब शायद अधिकारियों के पास नहीं है: जौरा थाना प्रभारी: अपराधी के साथ "कंधे पर हाथ" रखकर निभाई गई दोस्ती की चर्चा आज भी गलियारों में है। सबलगढ़ टीआई का बाइक चोर के साथ जन्मदिन का जश्न मनाना अनुशासन की धज्जियां उड़ाने जैसा है‌। रेत माफियाओं का ज़िले के अधिकांश थानो के सामने से निकलना विभाग की साख को भोपाल तक हिला दिया है। जिन पत्रकारो ने जौरा की थाने की खबरो को गंभीरता से दिखाया उनसे पुलिस ने दूरी बनाई क्या पुलिस के होली मिलन समारोह में भी अपराधी शामिल हो रहे थे जो पत्रकारो को दूर रखा कही फिर कोई ख़बर ना निकले वहीं तमाम खबरें सुर्खियों में आईं, तो मुख्यालय से जवाब-तलब हुआ। अब संवाद का रास्ता बंद करना इस बात का सीधा प्रमाण है कि अफसर 'सच' का सामना करने की हिम्मत खो चुके हैं। *लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर प्रहार* पत्रकारिता का धर्म चाटुकारिता नहीं, बल्कि सत्य का अन्वेषण है। अगर सच्ची खबरें अफसरों की नींद उड़ा रही हैं, तो समाधान 'बहिष्कार' नहीं बल्कि 'सुधार' होना चाहिए। पुलिस का यह कदम न केवल अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि महकमा अपनी गलतियों को सुधारने के बजाय उन्हे रसूख के पीछे दबाना चाहता है। "सच को फाइलों में कैद किया जा सकता है, लेकिन समाज की चेतना से मिटाया नहीं जा सकता। अधिकारियों को यह समझना होगा कि आईना तोड़ने से चेहरा साफ नहीं होता।" *अधूरा रहा 'मिलन'* पत्रकारों के एक बड़े वर्ग की अनुपस्थिति में यह होली मिलन महज एक औपचारिकता और 'अहंकारी प्रदर्शन' बनकर रह गया। प्रशासन का यह 'सिलेक्टिव बायकाट' (चुनिंदा बहिष्कार) आने वाले समय में पुलिस और प्रेस के बीच की खाई को और गहरा कर सकता है। *सवाल अभी भी खड़ा है:* क्या मुरैना पुलिस अपनी छवि सुधारने के लिए जमीनी काम करेगी, या इसी तरह 'सच' को रोकने की कोशिशों में अपनी ऊर्जा बर्बाद करेगी?

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