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बिन हरि कृपा मिले नहीं संता

जिसने गुरु को रिझा लिया, जिसने गुरु की कृपा-दृष्टि को अपनी और फेर लिया उसके लिए किसी साधन की आवश्यकता नहीं है। ऐसों के द्वार पर ही हर समय भगवान खड़े दिखाई पड़ते हैं और ऐसों से वे बड़े प्रसन्न रहते हैं। जो लोग मूर्खतावश गुरु की अवहेलना करते हैं, उनके ऊपर पूरे निर्भर नहीं होते और गुरु की हर बात को, उनके हर एक उपदेश को, अपने क्षुद्र और अंधकारमय बुद्धि की कसौटी पर कसे बगैर नहीं मानते, ऐसे शिष्य हजार साधन करने पर भी नर्कगामी ही होते हैं। यही एक भेद की बात है जिसको लोग कम समझते हैं। संत-मार्ग में गुरु-उपासना ही सबसे श्रेष्ठ उपाय है। इस मत में यद्यपि दूसरे साधन भी बतलाए जाते हैं और कराए जाते हैं परंतु गुरु-भक्ति और गुरु सत्संग को ही सबसे उत्तम और मुख्य माना जाता है, इसी के द्वारा साधक को अति शीघ्र सब कुछ प्राप्त हो जाता है। साधक का मुख्य धर्म यह है कि हमेशा हर हाल में अपने हृदय का मुख अपने गुरु की तरफ रखें और जब कभी कहीं से कुछ प्राप्त हो उसको उसी की कृपा का फल समझे वह चाहे भले ही किसी दूसरी जगह से मिला हो।

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