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जौरा सिस्टम की ‘एम्बुलेंस’ पंक्चर, मौत से लड़ रहे घायलों के लिए ‘देवदूत’ बना राहगीर

जौरा/मुरैना। एक ओर सरकार करोड़ों रुपये फूंक कर दावा करती है कि 'एक कॉल पर एम्बुलेंस हाजिर होगी', लेकिन जमीनी हकीकत मुरैना के जौरा में खून से सनी सड़क पर दिखाई दी। एमएस रोड स्थित सांकरा फाटक के पास एक बेकाबू कार ने बाइक सवारों को इतनी जोरदार टक्कर मारी कि दोनों उछलकर सड़क पर जा गिरे। चीख-पुकार मची, खून बहता रहा और घायल 15 मिनट तक सड़क पर तड़पते रहे, लेकिन 108 एम्बुलेंस का कहीं पता नहीं था। प्रशासनिक लकवा: दावों की खुली पोल हादसे के बाद मौके पर मौजूद भीड़ एम्बुलेंस को फोन लगाती रही, लेकिन जिम्मेदार कुंभकर्णी नींद में सोए रहे। यह महज एक हादसा नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की संवेदनहीनता का सबूत है। अगर 15 मिनट तक घायल सड़क पर दम तोड़ देते, तो क्या स्वास्थ्य विभाग इसकी जिम्मेदारी लेता? राहगीर की मिसाल: जब इंसानियत ने संभाला मोर्चा जब सिस्टम ने घुटने टेक दिए, तब एक स्थानीय युवक फरिश्ता बनकर सामने आया। युवक ने कानून के पचड़ों और खून के धब्बों की परवाह किए बिना अपनी निजी गाड़ी में दोनों लहूलुहान घायलों को लादा और अस्पताल की ओर दौड़ लगा दी। घायलों की नाजुक हालत को देखते हुए उन्हें प्राथमिक उपचार के बाद जिला अस्पताल रेफर किया गया है। फरार आरोपी और पुलिस की सुस्ती घटना के बाद आरोपी कार चालक मौके से भागने में सफल रहा। पुलिस अब सीसीटीवी फुटेज और जांच की बात कह रही है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि एमएस रोड जैसे व्यस्त मार्ग पर भी आपातकालीन सेवाएं इतनी लाचार क्यों हैं? आखिर कब तक जनता के जीवन के साथ यह 'सिस्टम' खिलवाड़ करता रहेगा? तीखा सवाल (Box News): कलेक्टर साहब ध्यान दें! > सांकरा फाटक का यह हादसा चीख-चीख कर पूछ रहा है कि क्या मुरैना में गरीबों की जान की कोई कीमत नहीं? 108 एम्बुलेंस का लेट होना महज इत्तेफाक है या भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ी कोई बड़ी लापरवाही? जवाबदेही तय होनी ही चाहिए।

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