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मध्यप्रदेश

भाजपा में बागियों का बोलबाला… सकते में आया संगठन

भोपाल । प्रदेश की 19 स्थानीय निकायों में चुनाव चल रहे हैं जिसमें से 17 तो इंदौर संभाग में ही हैं। चुनाव में बागियों के बोलबाले की वजह से भाजपा की जमकर फजीहत हो रही है। कुछ को सत्ता की लॉलीपॉप देकर बैठाया लेकिन बड़ी संख्या में नाराज अभी भी किला लड़ा रहे हैं जो बैठने के लिए तैयार नहीं हैं। बेकाबू हो रही स्थितियों को नियंत्रण करने के लिए इंदौरी नेताओं को भी काम पर लगाया जा रहा है।

चार महिने पहले जिला पंचायत और नगरीय निकाय के चुनाव हुए थे जिसमें भाजपा को जोरदार सफलता हासिल हुई। प्रदेश में 19 ऐसे स्थानीय निकाय हैं जिनका कार्यकाल चार माह बाद खत्म होना है। उन सभी निकायों में चुनाव चल रहे हैं। उसमें से एक नगर पालिका राघौगढ़ की है तो एक परिषद अनूपपुर का जैतहरी है जो कि इंदौर संभाग से बाहर है। इसके अलावा 17 बड़वानी और धार जिले में आती है। जहां पर त्रिकोणीय मुकाबले चल रहे हैं।

पर्दे के पीछे की कहानी ये है कि सभी जगहों पर भाजपा के बागियों की बहार आई हुई है। खासतौर पर धार जिले की हालत बहुत ज्यादा खराब है। यहां अधिकांश नगर परिषद व पालिकाओं में पार्टी के टिकट नहीं दिए जाने पर दावेदारों ने मैदान संभाल लिया। ऐसी स्थिति है कि कई जगह तो बागी कड़ी टक्कर दे रहे हैं और भाजपा प्रत्याशी की हालत खस्ता बनी हुई है। प्रत्याशियों की हालत देखकर संगठन भी सकते में हैं कि अंतर्कलह कहीं बड़ा नुकसान न करा दे। एक तरफ तो पार्टी आने वाले विधानसभा चुनाव के मोड पर काम कर रही है तो दूसरी तरफ ये स्थानीय निकाय के चुनाव हार जाए तो माहौल गड़बड़ा जाएगा। इधर कांग्रेस पूरी ताकत और ईमानदारी से चुनाव लड़ रही है। उन्हें मालूम है कि चुनाव जीतते ही प्रदेश में माहौल बनना शुरू हो जाएगा। इधर पार्टी ने कुछ महत्वपूर्ण पालिका व परिषद हैं जिसमें चुनाव मैनेजमेंट के जानकारों को भेजना शुरू कर दिया है।

इंदौरियों को जिम्मेदारी
इंदौर से नारायण पटेल को धामनोद गोपाल चौधरी को धरमपुरी और अजयसिंह नरुका को धार में भेजा गया। मजेदार बात ये भी है कि धार में पहले खंडवा के हरीश कोटवाले को भेजा गया था लेकिन जब वे नहीं गए तो खरगोन प्रभारी सुरेश आर्य को नियुक्त किया गया। वे भी नहीं जा सके तो नरुका को जिम्मेदारी सौंपी गई।

पुराने बागी बने प्रत्याशी
पालिका व परिषद के चुनाव में एक बड़ी विसंगति सामने आई है। इस बार पार्टी ने कई टिकट ऐसे भी दिए जिनके नाम को लेकर बवाल हुआ। उसमें से कई तो ऐसे भी हैं जो कि पिछले चुनाव में बागी थे। पार्टी ने उन्हें निष्कासित तो कर दिया था लेकिन बाद में विधानसभा व लोकसभा चुनाव के दौरान उनकी सजा माफ कर दी गई। इस बार उपकृत कर दिया। एक ये वजह भी है जो बागी बैठने के लिए राजी नहीं है। उन्हें मालूम है कि आने वाले विधानसभा व लोकसभा चुनाव में उन्हें पार्टी में फिर से ले लिया जाएगा। वह भी भविष्य के चुनाव में टिकट देने के वादे के साथ। इस फेर में कई जगह पार्टी प्रत्याशी ओंधे मुंह भी गिर सकते हैं।

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