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गुरु और संत के क्रोध से कभी किसी का नुक़सान नहीं होता

भगवान,गुरु संत के क्रोध से कभी भी किसी को हानि नहीं हो सकती। उनका क्रोध मनुष्य को सही रास्ते पर लाने के लिए होता है। उनका मकसद नुकसान पहुंचाना नहीं होता है। भगवान, गुरु, संत के क्रोध वास्तव में तात्कालिक और व्यावहारिक होते हैं जो मनुष्य को सही राह पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं। हृदय में उनके कभी क्रोध या कटुता नहीं होती, क्रोध करते समय भी उनके हृदय में अपने शिष्य के लिए काफी पीड़ा होती है, लेकिन यदि वे ऐसा नहीं करें तो मनुष्य राह से भटक जाएगा। साधु लोगों को भी साधुलता लाने के लिए कठोर होना ही पड़ा है। कठोरता हृदय में नहीं होती, केवल व्यवहार में होती है। भरत और लक्ष्मण का प्रेम पूर्णत: विरोधाभासी है। लक्ष्मण का प्रेम दिखाई देता है परंतु भरत का प्रेम दिखाई नहीं देता। क्रिया देखकर जो प्रेम होता है उससे वास्तविक प्रेम की पहचान नहीं हो पाती। विरोध में खड़ा व्यक्ति भी प्रेमी होता है लेकिन उसका प्रेम समर्पण वाला कहलाता है और यही भरत जी का भगवान राम के प्रति प्रेम हैं। जिसमें दिखावा नहीं केवल समर्पण और आज्ञा मानने वाला है। संसार से बैराग्य और भगवान से अनुराग तभी संभव है जब मनुष्य अपने अंदर की वृत्तियों पर पूरी तरह से नियंत्रण पा लें। व्यवहार जगत में रहते हुए भी उसके अंदर हमेशा केवल भगवान के प्रति अनुरक्ती होनी चाहिए तभी वह संसार के प्रेम बंधन से निकलकर भगवान के चरणों में सकता है और अंदर की इन वृत्तियों पर तभी विजय प्राप्त की जा सकती है जब भगवान की कृपा होती है। वशिष्ठ और विश्वामित्र भगवान राम के दो गुरु थे लेकिन दोनों गुरुओं में आपस में होड़ थी। जबकि भरत में सारा सामर्थ्य होने के बावजूद भी उनके मन में किसी भी प्रकार की कोई इच्छा नहीं थी और ना ही किसी वासना की वृत्ति में उनका लगाव था इसलिए उन्होंने केवल एक जन्म नहीं अनेक जन्मों के लिए केवल एक ही इच्छा रखी और वह थी भगवान श्रीराम के चरणों की रति। इसलिए भरत जी गुरुओं से भी ऊपर उठकर हैं। संसार का ऐश्वर्य हमेशा नहीं रहता

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