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सरकारी योजनाओं पर लग रहा पलीता: धरातल पर दम तोड़ रही जनहितैषी नीतियां
सरकारी योजनाओं पर लग रहा पलीता: धरातल पर दम तोड़ रही जनहितैषी नीतियां देश के विकास और आम नागरिकों के कल्याण के लिए सरकार द्वारा हर साल अरबों-खरबों रुपये की योजनाएं शुरू की जाती हैं। इनमें आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, और रोजगार से जुड़ी तमाम महत्वाकांक्षी नीतियां शामिल हैं। हालांकि, जमीनी हकीकत इन कागजी दावों से कोसों दूर नजर आती है। भ्रष्टाचार, प्रशासनिक लापरवाही और लचर निगरानी व्यवस्था के कारण इन योजनाओं पर लगातार पलीता लग रहा है। सबसे बड़ी समस्या योजनाओं के क्रियान्वयन (इम्प्लीमेंटेशन) में आने वाली धांधली है। बिचौलियों की संलिप्तता के चलते पात्र लाभार्थियों तक सही समय पर सहायता नहीं पहुंच पाती। गरीबों के लिए बने आवास, वृद्धा पेंशन, और राशन वितरण प्रणालियों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं सामने आती हैं। कई जगह कागजों में विकास दिखाया जाता है, जबकि धरातल पर स्थिति जस की तस बनी रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल योजनाएं बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी पारदर्शी मॉनिटरिंग और जवाबदेही तय करना भी उतना ही जरूरी है। जब तक जमीनी स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगेगी और दोषियों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, तब तक योजनाओं का वास्तविक लाभ अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुंच पाएगा। सरकार और प्रशासन को मिलकर इस व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए ठोस कदम उठाने की सख्त जरूरत है।


