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सत्संग का महत्व

सत्संग के बिना विवेक नहीं होता और भगवान की कृपा के बिना वह सत्संग सहज में मिलता नहीं। सत्संगति आनंद और कल्याण की जड़ है। सत्संग की सिद्धि (प्राप्ति) ही फल है और सब साधन तो फूल है॥ भगवान की कृपा निष्काम भाव से कर्तव्य समझ कर कर्म करने से प्राप्त होती है, इसलिये मनुष्य को संसार में भगवान की कृपा प्राप्त करने के लिये ही कर्म करना चाहिये। जब तक हम कर्जदार रहेंगे तो मुक्त कैसे हो सकते हैं? यह तभी संभव हो सकेगा जब कि हम इस संसार से नया कर्जा नहीं लेंगे, संसार तो केवल हमसे वस्तु ही चाहता है हमें कोई नहीं चाहता, हम सभी पर मुख्य रूप से दो प्रकार का कर्जा है, एक शरीर जो प्रकृति का कर्जा है, दूसरा आत्मा जो परमात्मा का कर्जा है, इसलिये हमें संसार से किसी भी वस्तु को पाने की इच्छा का त्याग कर देना चाहिये। शरीर सहित जो कुछ भी सांसारिक वस्तु हमारे पास है उसे सहज मन-भाव से संसार को ही सोंपना देनी चाहिये, हम स्वयं आत्मा स्वरूप परमात्मा के अंश हैं इसलिये स्वयं को सहज मन से परमात्मा को सोंप चाहिये यानि भगवान् के प्रति मन से, वाणी से और कर्म से पूर्ण समर्पण कर देना चाहिये। मानव जीवन का एक मात्र उद्देश्य है, यही मनुष्य जीवन का एक मात्र लक्ष्य है, यही मानव जीवन की परमसिद्धि है, यही वास्तविक मुक्ति है, यह मुक्ति शरीर रहते हुये ही प्राप्त होती है, इसलिये यह मनुष्य जन्म अत्यन्त दुर्लभ है।

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