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धार्मिक

मौन का तन मन की सुन्दरता के लिये महत्व 

प्रत्येक मनुष्य सुन्दर एवं स्वस्थ्य रहना चाहता है। सुन्दरता एवं स्वस्थ्य का राज मौन मै छिपा हुआ है। सामान्यत: चुप रहना मौन है, प्राचीन पुराण बचन के साथ ईष्या, डाह, छल, कपट और हिन्सा को कम करना मोन होता है। मनोवैज्ञानिक ‘फ्रायड’ का कहना है कि जीवन अन्तर्द्वद्वी शृंखलाओं से मिल कर बना है। अन्तर्द्वद्व दो या दो से अधिक विरोधी इच्छाओं का एक साथ उत्पन्न होना है। ये असीम इच्छायें पूर्ण न होने पर तनाव नामक बीमारी देती है। जिससे आज के अधिकांस व्यक्ती ग्रासित है। अन्तर्द्वद्व में फंसे व्यक्ति की स्थिति कई विपरीत दिशाओं से आने वाली नदियों के पानी के साथ मिलने से भॅवर बनती है कि जैसी हो जाती है। भॅवर में फसे व्यक्ति को न बैठे शांति मिलती है न लेटे, न भूख लगती है, न प्यास, न ही ध्यान अध्ययन में मन लगता है। याददास्त क्षमता कम हो जाती है। हार्ट अटेक, आत्म हत्या भी इसी कारण करते हैं।
हर मनुष्य अन्नत शक्तिमान है। यह शक्ति  मन एवं पाचों इन्द्रियों के कार्यो में खर्च होती है। मन एवं इन्द्रियों को बस मे करने का कार्य ‘मौन’ करता है। मौन रहने से मनुष्य के अन्दर की छुपी हुई शक्ति उदय हो जाती है। आज के कल युग में इनद्रिय विषय-भोगों की सामग्री में वहुत वृद्धि हूई है जिसे अपनाने पर इक्छा शक्ति में अधिक बृद्धि हो रही है। जो  टेन्सन को जन्म देती है। अत: आज टेन्सन बड़ी बीमारी हो गई है। जो भी व्यक्ति अधिक बोलते है उनके मुख में रहने वाला पाचक रस सूख जाता है। मानसिक सन्तुलन खो जाता है, हृदय गति तेज हो जाती है। मान इन सब परेशानियों से बचने की राम वाण औषधी है। दिन में एक घण्टा मौन रहने पर दो घण्टे की कार्य क्षमता में बृद्धि होती है। रक्त प्रवाह सामान्य स्वस्थ्य होता है, तन, मन, सुन्दर बनता है। अत: संयमित वोल मान को जीवन में अपनाना चाहिये।

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