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विश्व के भाल पर दमकती हिंदी

(विजय पाण्डेय) देश के प्रमुख हिंदी समाचार-पत्र के प्रथम पृष्ठ पर प्रकाशित “अमेरिका के एक हजार स्कूलों में हिंदी भाषा की पढ़ाई शुरू होगी“ खबर को पढ़कर सुबह-सुबह मन प्रसन्न हो गया। बेशक यह एक खबर थी लेकिन हर भारतीय के लिए फक्र की बात है। क्योंकि हम जिस अंग्रेजी को बोलने में इतराते और इठलाते हैं और कुछ लोग हिंदी बोलने और सुनने पर मुंँह बनाते नजर आते हैं उनके लिए एक सबक है.... यह बात सच है कि अंग्रेजी इंप्रेशन (प्रभाव) जमाने की भाषा है जबकि हिंदी अभिव्यक्ति की। भाषा विचारों को अभिव्यक्त करने का एक सशक्त माध्यम है। हिंदी एक समृद्ध भाषा है। जिसके पास उसकी बोलियों की बहुत बड़ी ताकत है। हिंदी के अंदर यह एक सबसे बड़ी खूबी है, कि वह सहज ढंग से स्वीकार्य सभी शब्दों को समाहित करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि ग्लोबलाइजेशन (वैश्वीकरण) के इस दौर में हिंदी देश और दुनिया में अपनी धाक जमा रही है। वैश्वीकरण ने जहां एक तरफ मुक्त बाजार की दलीलें पेश की हैं तो दूसरी तरफ दुनिया में एक नई उपभोक्ता संस्कृति को भी जन्म दिया है। आजकल संयुक्त राष्ट्र और विश्व की प्रमुख भाषाओं में हिंदी को शुमार करने की ठोस दलीलें दी जा रही हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों का आयोजन भी एक ऐतिहासिक परिवर्तन की आहट है। परिभाषा प्रसिद्ध भाषा वैज्ञानिक नोम चॉमस्की ने वैश्वीकरण का अर्थ अंतरराष्ट्रीय एकीकरण माना है। इस एकीकरण में भाषा की अह्म भूमिका रहेगी, उसी का स्थान विश्व में सुनिश्चित होगा, जिसका बाजार में व्यापार करने के लिए जिस भाषा को प्राथमिकता दी जाएगी और वही भाषा जीवित रहेगी। क्योंकि वैश्वीकरण के युग में कोई सीमा, कोई सरहद या कोई दीवार नहीं है। यही वजह है कि इंटरनेट पर भी दिनों-दिन हिंदी का दबदबा बढ़ता ही जा रहा है। तो दुनिया के अनेक देशो में हिंदी अपनी जड़ें जमा रही है। अमेरिका में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक पार्टी के संगठन एशिया सोसायटी और इंडियन अमेरिकन इम्पैक्ट से जुड़े एक सैकड़ा जनप्रतिनिधियों ने राष्ट्रपति बाइडेन को स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई का प्रस्ताव सौंपा है। प्रस्ताव के अंतर्गत 816 करोड़ रुपए की राशि से एक हजार स्कूलों में प्राथमिक स्तर पर हिंदी की पढ़ाई शुरू होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि स्टूडेंट्स को अंग्रेजी के बाद हिंदी को दूसरी भाषा के रूप में चुनने का विकल्प होगा। इससे युवाओं में हिंदी की समझ बढ़ेगी और भविष्य में जब भारत दुनिया की तीसरी आर्थिक शक्ति होगा तब अमेरिका के युवाओं के लिए हमारे देश में अनेक संभावनाएं बढ़ेंगी। ऐसा नहीं कि अमेरिका ही हिंदी को बढ़ावा देने की पहल कर रहा है। 54 लाख की आबादी वाले नार्वे देश में संगीता शुक्ला ने पहला हिंदी स्कूल खोला, नतीजा यह हुआ कि नार्वे के हर घर में गीता पढ़ी जाती है। प्रति वर्ष रामायण और रामलीला के आयोजन होते हैं। लंदन, जर्मन, नेपाल, नार्वे और फिजी सहित विभिन्न देशों में हिंदी अपना प्रभाव छोड़ रही है। जर्मनी में ऐसे स्कूल हैं जहां बच्चों को हिंदी के साथ ही संस्कृत पढ़ाई जा रही है। बच्चों को जनेऊ धारण कराकर पत्तल पर भोजन कराया जा रहा है। लंदन के स्कूल में हिंदी पढ़ाई जा रही है और संस्कृत में प्रार्थना होती है। लंदन के लोगों को मानना है कि भारतीय भाषा के ज्ञान से उनके बच्चों की सोच बदल रही है। हिंदी की अंतरराष्ट्रीयता बढ़ती जा रही है। कयोंकि हिंदी सोच बदलने वाली भाषा है। विश्व स्तर पर सरकारी काम-काज में अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, चीनी, रूसी और अरबी को अंतरराष्ट्रीय भाषाओं का स्थान प्राप्त है। हिंदी भी संयुक्तराष्ट्र संघ में अंतरराष्ट्रीय भाषा का स्थान प्राप्त करने के लिए निरंतर प्रयासरत है। अंतरराष्ट्रीय वैश्वीक भाषा के रूप में िंहंदी की उपयोगिता को विश्व व्यापारिक समुदाय अब भलिंभांति समझ चुका है। वैश्वीकरण में आर्थिक और सांस्कृतिक दोनों तरह से हिंदी की भूमिका बढ़ रही है। ऐसे में यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा कि विश्व के भाल पर दमकती हिंदी दुनिया में अपनी धाक जमा रही है।

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