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जबलपुर हाई कोर्ट ने कहा-टीआई जांच रिपोर्ट दबाकर न बैठें, मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करें।

जबलपुर। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया की एकलपीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण आदेश में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि टीआई जांच रिपोर्ट दबाकर न बैठें, संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करें। पुलिस महानिदेशक को आदेशित किया जाता है कि वे इस सिलसिले में आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करें।दरअसल, बालाघाट जिले के वारासिवनी निवासी लखीराम रामचंदानी सहित अन्य की ओर से दायर की गई याचिका में क्रिमिनल रिवीजन आवेदन की सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा जारी आदेश को निरस्त किए जाने की राहत चाही गई थी। दायर याचिका में कही था ये बात याचिका में कहा गया था कि अनावेदक विनोद सचदेव की ओर से हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने याचिका का निराकरण इस निर्देश के साथ कि था कि याचिकाकर्ता संबंधित थाना प्रभारी के समक्ष शिकायत पेश करें। थाना प्रभारी शिकायत की जांच कर विधि अनुसार कार्यवाही करेंगे। जांच में हुआ था ये खुलासा थाना प्रभारी ने जांच में पाया था कि कोई संज्ञेय अपराध नहीं बनता है। जिसके बाद याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने पाया था कि आदेशानुसार थाना प्रभारी ने प्रकरण की जांच की है। हाई कोर्ट ने अवमानना याचिका को निरस्त कर दिया। इसके बाद जेएमएफसी कोर्ट में आवेदन दायर किया गया था। जेएमएफसी कोर्ट ने आवेदन को निरस्त कर दिया। लिहाजा, एएसजे के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन दायर की गई थी। एएसजे ने जेएमएफसी कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए पुन: सुनवाई के आदेश जारी किए गए थे। ये आदेश जारी हुए है जेएमएफसी कोर्ट ने पुन: सुनवाई करते हुए जांच के आदेश जारी किए। सुनवाई के दौरान अनावेदक की ओर से तर्क दिया गया कि सभी याचिकाकर्ता सिंधी समाज कल्याण समिति के सदस्य थे। उन्होने दान में रुपये लेकर दुकानों का निर्माण किया और दान देने वालों पर दुकान आवंटित कर दी। दान लेने के लिए कोई बैंक खाता भी नहीं खोला था। उन्होंने पूज्य सिंधी समाज श्री गुरु नानक धर्मशाला के नाम की रसीद दी थी। समिति का रजिस्ट्रेशन निरस्त होने के कारण सीए ने भी अपनी ऑडिट रिपोर्ट को निरस्त कर दिया था। हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि थाना प्रभारी ने अपनी जांच रिपोर्ट संबंधित मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत नहीं की थी। मजिस्ट्रेट संबंधित जांच रिपोर्ट का अवलोकन करते हुए धारा 156 (3) के आवेदन पर आदेश जारी कर देते। हाई कोर्ट ने पाया कि अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने सीआरपीसी में दिये प्रविधानों का उपयोग करते हुए उक्त आदेश जारी किए हैं।

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