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स्थिर फल देती है ब्रह्मपुराण कथा आज अक्षय तृतीया की संध्या पर श्रीगोपालजी धाम, दयालबाग में श्रीब्रह्मपुराण कथा का शुभारंभ हुआ।

गुरुदीपिका योगक्षेम फाउंडेशन के तत्वावधान में हो रही इस सप्त दिवसीय कार्यक्रम में कलश स्थापना के साथ कथा प्रारंभ हुई। फाउंडेशन की निदेशक वारिजा चतुर्वेदी ने बताया कि अठारह पुराणों में प्रथम स्थान पर ब्रह्म पुराण है। इसमें भगवान जगन्नाथ जी की महिमा एवं उनके पूजन के विषय में विस्तार से बताया गया है किंतु लोक में इसका चलन कुछ कम है। फाउंडेशन उन सभी कल्याणकारी प्राच्य ग्रंथों को लोगों तक पहुंचाने का प्रयास कर रहा है। इस पावन कथा से उत्तर भारत के लोग भगवान जगन्नाथ की महिमा से परिचित हो सकेंगे। ब्रह्मलीन द्विपीठाधीश्वर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती जी की शिष्या डॉ दीपिका उपाध्याय कथा प्रवचन करेंगी। प्रथम दिवस कथा प्रारंभ करते हुए डा दीपिका उपाध्याय ने बताया कि ब्रह्म पुराण की कथा स्थिर फल देने वाली है। इसका अर्थ यह है कि इस पावन कथा को सुनकर मनुष्य का चित्त धर्म में प्रवृत्त हो जाता है और कार्य न कर पाने की पीड़ा समाप्त हो जाती है। भगवान जगन्नाथ मनुष्य को स्वयं ही धर्म कार्य में प्रवृत्त करने वाले हैं और कार्य करने की योग्यता देने वाले हैं। उनकी कृपा से ही सृष्टि के प्रथम प्रजापति स्वायंभुव मनु एवं महारानी शतरुपा के वंश में राजा उत्तानपाद एवं भक्त ध्रुव जैसे पुण्यात्मा हुए। इसी वंश में महात्मा अंग जैसे प्रतापी राजा का पुत्र वेन हुआ जो भारी अभिमानी था। देवों की पूजा, यज्ञ आदि बंद करवा देने से कुपित होकर ऋषियों ने उसे श्राप दिया और वह मृत्यु को प्राप्त हुआ। किंतु ऐसे दुरात्मा से ही महाराजा पृथु जैसे वीर, तेजस्वी तथा मानव मात्र का कल्याण करने वाले राजा उत्पन्न हुए। राजा पृथु ने मनुष्यों की सुविधा के लिए धरती को कृषि योग्य बनवाया तथा जन-जन के लिए धरती का सुख सुलभ किया। धरती को नवीन रूप देने के कारण ही वह राजा पृथु की पुत्री 'पृथ्वी' नाम से जानी जाने लगी। ब्रह्म पुराण में आता है कि यदि मनुष्य राजा पृथु का नाम लेकर कार्य आरंभ करता है तो उसे सफलता अवश्य मिलती है। इसी प्रकार वर्तमान मन्वंतर के स्वामी वैवस्वत मनु के वंश में महाप्रतापी राजा इक्ष्वाकु हुए। इनके वंशज राजा कुवलाश्व ने धरती पर रहने वाले मनुष्यों के कल्याण हेतु महान असुर धुन्धु का वध किया। राजा का कार्य ही प्रजा की रक्षा करना है, चाहे उसे इसका कोई भी मूल्य चुकाना पड़े। इसी का अनुकरण करते हुए राजा ने अपने 100 में से 97 पुत्र असुर से युद्ध करते हुए खो दिए और 'धुन्धुमार' कहलाए। कथा को आगे विस्तार देते हुए कथावाचक ने इसी वंश के सत्यव्रत की कथा सुनाई जिनके दुष्प्रवृत्ति के होने के कारण उनके राज्य में वर्षा बंद हो गई थी। उनके पिता ने उन्हें राज्य से निकाल दिया। तब वन में भटकते हुए उन्होंने महर्षि विश्वामित्र के पुत्र की रक्षा की तथा तप करकेअपना राज्य प्राप्त किया। इन्हीं के पुत्र हुए सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र। सूर्यवंश के बाद चंद्रवंश की कथा सुनाते हुए कथावाचक ने बताया कि चंद्रवंश में अनेक प्रतापी राजा हुए हैं जिनमें कार्तवीर्यार्जुन का नाम प्रमुख हैं जिन्हें सहस्रबाहु कहा जाता है। इस प्रतापी राजा ने लंकेश रावण को बंदी बना लिया था किंतु अभिमान के कारण ही महर्षि वशिष्ठ के श्राप के कारण परशुराम जी ने इनका वध कर दिया। इस प्रतापी राजा के वध का कारण बनी थी एक गाय। डॉ दीपिका उपाध्याय ने इस अवसर पर उपस्थित जनमानस से गौ रक्षा की अपील की। पुराण कथा के दौरान फाउंडेशन के निदेशक रवि शर्मा ने समस्त व्यवस्थाएं संभाली। संगीत एवं कीर्तन व्यवस्था में वरदान उपाध्याय ने सहयोग किया। इस अवसर पर कांता शर्मा, दिनेश शर्मा, पूनम, निष्ठा आदि उपस्थित रहे।

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