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मुरैना: प्यासे राहगीरों के लिए ‘रेगिस्तान’ बना नगर निगम पारा 35 डिग्री, मुरैना का प्रशासन अभी भी ‘कोमा’ में

मुरैना में गर्मी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। मार्च के आखिरी दिन तापमान 35 डिग्री के स्तर को पार कर गया है, लेकिन नगर निगम के गलियारों में सन्नाटा पसरा है। सड़कों पर जूझते लोग पानी की एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। 2. आम आदमी की प्यास, निगम के लिए 'मजाक' शहर के मुख्य चौराहों—स्टेशन रोड, बैरियर चौराहा और अंबाह स्टैंड—पर राहगीरों का तांता लगा रहता है। लेकिन इन व्यस्त जगहों पर प्याऊ का नामो-निशान नहीं है। ऐसा लगता है कि मुरैना प्रशासन ने मान लिया है कि प्यास बुझाना उनकी जिम्मेदारी ही नहीं है। 3. हर जेब में नोट नहीं, फिर भी पानी की लूट निगम के अधिकारी भूल गए हैं कि मुरैना से गुजरने वाला हर व्यक्ति समृद्ध नहीं है। मजदूर, किसान और रिक्शा चालक लू की चपेट में आने को मजबूर हैं। क्या वे 20 रुपये की पानी की बोतल खरीदकर अपनी दिहाड़ी खत्म करें या परिवार के लिए रोटी कमाएं? 4. विकास के दावे और सूखे नल की हकीकत शहर में विकास के बड़े-बड़े दावों के बीच सार्वजनिक नल केवल सजावट का सामान बनकर रह गए हैं। पाइपलाइनें बिछी हैं, लेकिन पानी 'नदारद' है। यह विफलता किसकी है? 5. एसी कमरों में बंद फाइलों में प्याऊ नगर निगम के उच्चाधिकारियों के वातानुकूलित कमरों में फाइलों पर तो प्याऊ की योजनाएं छपी होंगी, लेकिन धरातल पर उनकी धमक कहीं नहीं है। 6. स्वास्थ्य पर खतरा, प्रशासन बेपरवाह भीषण गर्मी में पानी न मिलने से लोग डिहाइड्रेशन और हीटस्ट्रोक का शिकार हो रहे हैं। यह स्थिति केवल असुविधा नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य के साथ आपराधिक खिलवाड़ है। 7. बजट कहाँ जा रहा है? जवाब दे निगम! पेयजल व्यवस्था के नाम पर हर साल करोड़ों रुपये का बजट कहाँ खर्च होता है? क्या वह पैसा सिर्फ कागजों की स्याही में बह जाता है? 8. जनहित का काम, संस्थाओं के नाम मुरैना में जब भी व्यवस्था चरमराती है, सामाजिक संस्थाएं ही ढाल बनती हैं। लेकिन, निगम कब तक अपनी जिम्मेदारी दूसरों के कंधों पर डालेगा? 9. करदाताओं का पैसा, प्यास में तड़पता इंसान मुरैना की जनता टैक्स इसलिए देती है ताकि उन्हें बुनियादी सुविधाएं मिलें। लेकिन यहाँ उन्हें सिर्फ गर्मी के थपेड़े मिल रहे हैं। 10. चेतावनी: जन आक्रोश से बचकर रहना! मुरैना नगर निगम चेत जाए।

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