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मुरैना PHE का ‘सूखा’ सिस्टम: कागजों पर बह रही विकास की गंगा, प्यास से तड़प रहे ग्रामीण! फाइलों में लबालब, धरातल पर सूखा

मुरैना जिले में लोक स्वास्थ्य अभियांत्रिकी विभाग (PHE) इन दिनों जनसेवा के लिए नहीं, बल्कि अपनी घोर लापरवाही और कछुआ चाल कार्यप्रणाली के लिए सुर्खियों में है। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी 'जल जीवन मिशन' योजना मुरैना के सरकारी दफ्तरों की अलमारियों में दम तोड़ती नजर आ रही है। जिले के सैकड़ों गांवों में करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी नल सिर्फ दिखावे का शो-पीस बनकर रह गए हैं। भ्रष्टाचार और बदहाली का घालमेल विभाग की कार्यशैली का आलम यह है कि ठेकेदारों ने मनमर्जी से सड़कों को खोदकर पाइप डाल दिए, लेकिन उन्हें ढंकना भूल गए। आज स्थिति यह है कि न तो गांव की सड़कों पर चलने की जगह बची है और न ही उन पाइपों से पानी की एक बूंद टपकी है। कई पंचायतों में तो कागजों पर योजना को 'हैंडओवर' भी दिखा दिया गया है, जबकि हकीकत में टंकियां सफेद हाथी की तरह खड़ी हैं और उनमें जंग लग रहा है। घटिया निर्माण सामग्री के चलते आधे से ज्यादा बोरिंग पहली ही बार में फेल हो गए हैं। साहब की 'कुर्सी' ठंडी, जनता की 'बाल्टी' खाली जब ग्रामीण पानी की समस्या लेकर विभाग के दफ्तर पहुँचते हैं, तो उन्हें केवल आश्वासन का लॉलीपॉप थमाया जाता है। तकनीकी खराबी का बहाना बनाकर अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं। विडंबना देखिए कि चंबल और क्वारी जैसी नदियों के क्षेत्र वाले इस जिले में पानी के प्रबंधन का यह हाल है। विभाग की इस 'अच्छी' निगेटिव रिपोर्ट का सार यही है कि यहाँ पानी की समस्या प्राकृतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक है। अंधेरगर्दी का आलम बोरिंग से लेकर पाइपलाइन बिछाने तक के टेंडरों में जो 'खेल' खेला गया है, उसका खामियाजा आम आदमी भुगत रहा है। यदि समय रहते उच्च स्तरीय जांच नहीं हुई, तो मुरैना की प्यासी जनता का यह आक्रोश आने वाले समय में विभाग के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकता है। अधिकारियों की एसी वाले कमरों में बैठकर बनाई गई रणनीतियां जमीन पर धूल फांक रही हैं।

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