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मुरैना नगर निगम की ‘कागजी’ गौशाला और सड़कों पर ‘मौत’ का तांडव: कब जागेगा प्रशासन?

मुरैना , गौशाला के नाम पर 'मलाई' खा रहे अधिकारी सड़कों पर 'मर रही है गायें नगर निगम के बजट में गौशाला के नाम पर करोड़ों रुपये का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य सड़कों पर घूम रहे बेसहारा पशुओं को सुरक्षित आश्रय देना है। हकीकत यह है कि इन करोड़ों रुपयों का इस्तेमाल कागजों पर तो हो रहा है, लेकिन जमीन पर स्थिति जस की तस है। निगम का खजाना भर रहा है, लेकिन गौशाला के बाड़े खाली हैं और शहर की सड़कें इन बेसहारा गोवंशों की अघोषित शरणस्थली बन चुकी हैं। 2. टैक्सपेयर का पैसा पानी में, सड़क पर जान जोखिम में आम नागरिक हर साल समय पर नगर निगम को भारी-भरकम टैक्स देता है, ताकि उसे सुरक्षित और सुगम सड़कें मिल सकें। मगर आज आलम यह है कि शहर की मुख्य सड़कों पर गायों और सांडों का कब्जा है। गौशाला के नाम पर आ रहा धन आखिर किसकी जेब में जा रहा है? शहर की जनता को सुविधा देने के बजाय निगम ने उन्हें सांडों के बीच अपनी जान बचाने की चुनौती दे दी है। 3. रोज हो रहे हादसे, क्या किसी बड़ी मौत का है इंतजार? आए दिन सड़कों पर गोवंश के कारण वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो रहे हैं। दोपहिया वाहन सवार चोटिल हो रहे हैं, बुजुर्गों और बच्चों के लिए सड़क पार करना एक जंग जीतने जैसा है। निगम के अधिकारी अपने वातानुकूलित कमरों में बैठकर 'सब ठीक है' की रिपोर्ट तैयार करते हैं, जबकि बाहर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में सड़क हादसों के पीड़ित कराह रहे हैं। क्या प्रशासन किसी बड़ी अनहोनी या किसी मासूम की मौत का इंतजार कर रहा है? 4. जिम्मेदारों की चुप्पी और 'अंधेर नगरी' का खेल जब भी इस मुद्दे पर सवाल उठता है, निगम प्रशासन 'जल्द ही व्यवस्था ठीक कर दी जाएगी' का पुराना रिकॉर्ड बजा देता है। यह कैसी व्यवस्था है जो सालों से 'जल्द' के भरोसे अटकी है? यदि गौशाला पूरी क्षमता से काम कर रही है, तो हजारों की संख्या में गोवंश सड़कों पर क्या कर रहे हैं? यह सीधे तौर पर प्रशासनिक भ्रष्टाचार और घोर लापरवाही का मामला है। 5. अब जनता को चाहिए परिणाम, न कि खोखले आश्वासन अब समय आ गया है कि जनता कागजी दावों से संतुष्ट न हो। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि आवंटित धन का एक-एक पैसा कहाँ खर्च हुआ। यदि नगर निगम के पास इन पशुओं को रखने की जगह नहीं है, तो जनता के टैक्स का पैसा गौशाला के नाम पर क्यों लूटा जा रहा है? प्रशासन को तत्काल प्रभाव से सड़क खाली करवानी होगी, अन्यथा यह जनता का आक्रोश किसी दिन सत्ता की नींव हिला देगा। निष्कर्ष: गौमाता की सेवा के नाम पर हो रहा यह खेल अब और नहीं चलेगा। शहर की सड़कों को 'कुरुक्षेत्र' बनने से रोकना नगर निगम की प्राथमिक जिम्मेदारी है, जिसे वे पूरी तरह निभाने में नाकाम रहे हैं।

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