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पुरुषार्थ से ही सुसंस्कृत सभ्य समाज और सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण संभव।

(दिनेश सिंह सिकरवार ) आज के समय में सज्जनों की निष्क्रियता पर मुठ्ठीभर दुर्जनों की सक्रियता हाॉवी हैं। चहुं ओर व्यभिचार अनाचार अराजकता अनाचार अत्याचार शोषण का माहौल व्याप्त है।अब भारतीय नारियो को उच्च शिक्षा के साथ साथ वीरांगना बनाने की जरूरत है क्योंकि समाज में आज के हलातों को देख ऐसा लगता है कि अब ज्यादातर परिजनों को खासकर अपने लडकों को वीर धीर पुरुषार्थी के रूप में संस्कारित करने के लिए समय नहीं है। पाश्चात्य सभ्यता की होड़ ने घर परिवार व देश में अराजकता फैला दी है। जिसके दुष्परिणाम हर दिन सामने आ रहे हैं। समाज खुद की जिम्मेदारी से बच नही सकता है। हर काम सरकारों द्वारा नही किया जा सकता है। सत्ता में ऐसे ऐसे नायक हैं। अगर उन्हें ही अपना प्रेरणास्रोत मान लिया तो महाभारत के दुर्योधन और दुसासनों की ही संख्या बढ़ेगी। वैसे भी ज्यादा से ज्यादा सामाजिक संघठन और सरकारें सत्ता तथा आय का साधन बन गए हैं। फ्री कल्चर भी लोगों को बर्बाद कर रहा है। गुमराह करने वालों के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत है। आज की विषम परिस्थितियों के संघर्ष में प्रजातंत्र का चौथा स्तंभ अहम भूमिका निभाने का काम कर सकता है। बुद्धिमान लोगों को सक्रिता बड़ाना चाहिए। लोगो को महाराणा प्रताप और भामाशाह के चरित्र से प्रेरणा लेकर अपने अंदर से भीरूता कायरता डर भय की प्रवृतियों का त्याग कर साहस एवं पौरुष को जगाना होगा। और ऐसे महापुरूषों के चरित्रों का अनुसरण करना चाहिए तभी हम अपनों को एक सुसंस्कृत सशक्त सुदृढ़ सुन्दर सभ्य खुशहाल सामाजिक जीवन अपने राष्ट्रवासियों को। बसुधैव कुटुम्बकम के भावों के साथ और सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्व सन्तु निरामाया सर्वे भद्राणि पश्यंतु मा कश्चीत् दुःखभाग भवेत् ।। अर्थात् सभी सुखी होवें रोग मुक्त रहें सभी मंगलमय के साक्षी बनें और किसी को भी दुःख का भागी न बनना पड़े। तात्पर्य यह है कि हम मिलजुल कर किंकर्तव्यविमूढ़ता को त्यागकर आशावादी बन दुर्जनों की सक्रियता पर हावी होकर कार्य करेंगे तो निश्चित रूप से एक बेहतर इंसानियत से परिपूर्ण व सभ्य समाज देश की भावी पीढ़ियों के लिए विरासत के रूप में सौंप कर जाएंगे। इसीलिए प्रभु द्वारा विवेकशील प्राणी के रूप में मनुष्य की सृष्टि की रचना की गई है।

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