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मुरैना शहर वोट का घूँट पी गए नेता, प्यास बुझाने को एक मटका भी नसीब नहीं!
सूरज आग उगल रहा है, पारा 45 डिग्री के पार पहुँच चुका है, लेकिन शहर की सड़कों पर इंसानियत के नाते एक प्याऊ तक नसीब नहीं है। यह विडंबना ही है कि जो नेता चुनाव के समय जनता के लिए 'खून बहाने' का दावा करते हैं, आज वे एक मटका पानी उपलब्ध कराने में भी नाकाम साबित हो रहे हैं। शहर के मुख्य चौराहों, बस स्टैंड और बाजारों में राहगीर हलक सुखाए भटक रहे हैं। भीषण गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच गरीब मजदूर और मुसाफिरों के लिए सरकारी और प्रशासनिक स्तर पर किए गए तमाम दावे कागजी साबित हो रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि नगर निगम और स्थानीय प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया है, जबकि राजनेताओं की सक्रियता केवल वातानुकूलित कमरों में बैठकर प्रेस विज्ञप्तियां जारी करने तक सीमित रह गई है। नेताओं की 'कोरी राजनीति' का आलम यह है कि मंचों से विकास की बड़ी-बड़ी बातें तो होती हैं, लेकिन धरातल पर प्यासे कंठों को पानी देने के लिए कोई ठोस पहल नहीं दिखती। प्याऊ के नाम पर केवल पुरानी टूटी टंकियां और सूखी हुई टोटियां प्रशासन की संवेदनहीनता को मुंह चिढ़ा रही हैं। जनता अब सवाल पूछ रही है—क्या नेताओं की संवेदनाएं भी इस गर्मी में सूख चुकी हैं? वोट की राजनीति में मशगूल इन जन प्रतिनिधियों को आम आदमी की प्यास से कोई सरोकार नहीं है। अगर जल्द ही प्याऊ की व्यवस्था नहीं की गई, तो यह 'राजनीतिक सूखा' आगामी समय में नेताओं के लिए महंगा साबित हो सकता है।


