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पेट्रोल डीजल गैस किल्लत के बाद डिजिटल महाप्रलय का खतरा: क्या युद्ध की भेंट चढ़ जाएगा दुनिया का ‘इंटरनेट’?
आधुनिक युग में 'इंटरनेट' मानव जीवन की धमनियों के समान हो गया है। आज हम हर छोटे-बड़े काम के लिए डिजिटल कनेक्टिविटी पर निर्भर हैं। लेकिन, अब एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरी दुनिया के नीति-निर्माताओं और तकनीकी विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। रसोई गैस की कीमतों और किल्लत के बीच अब एक नया संकट 'इंटरनेट ठप' होने का मंडरा रहा है, जो वैश्विक स्तर पर एक डिजिटल महाप्रलय ला सकता है। समुद्र की गहराइयों में सुरक्षित नहीं हमारा 'डेटा' अक्सर लोग सोचते हैं कि इंटरनेट बादलों (क्लाउड) या हवा में है, लेकिन वास्तविकता यह है कि दुनिया का 97% ग्लोबल डेटा समुद्र की गहराइयों में बिछीं विशाल फाइबर ऑप्टिक केबल्स के माध्यम से एक महाद्वीप से दूसरे तक पहुँचता है। वर्तमान में होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) के आसपास चल रहे तनाव और युद्ध जैसी स्थितियों ने इन केबल्स को खतरे में डाल दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सैन्य संघर्ष के दौरान इन केबल्स को जानबूझकर या अनजाने में नुकसान पहुँचाया जाता है, तो पूरी दुनिया का संचार तंत्र पल भर में धराशायी हो सकता है। भारत पर क्या होगा असर? भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जिसकी डिजिटल अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, यह खबर किसी बड़े झटके से कम नहीं है। यदि समुद्री केबल्स बाधित होती हैं, तो: बैंकिंग और शेयर बाजार: ऑनलाइन लेनदेन पूरी तरह ठप हो जाएगा, जिससे आर्थिक व्यवस्था चरमरा सकती है। संचार सेवाएँ: इंटरनेट के बिना व्हाट्सएप, ईमेल और अन्य संचार माध्यम काम करना बंद कर देंगे। आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain): ई-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क प्रभावित होने से आवश्यक वस्तुओं की भारी किल्लत हो सकती है। महंगाई और किल्लत के बाद अब 'डिजिटल अंधेरा' पहले से ही बढ़ती महंगाई, पेट्रोल-डीजल की मार और रसोई गैस की किल्लत से त्रस्त आम जनता के लिए इंटरनेट का जाना एक दोहरी मुसीबत साबित होगा। आज के दौर में इंटरनेट केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि सरकारी सेवाओं से लेकर शिक्षा और स्वास्थ्य तक सब कुछ इसी पर टिका है। यदि 'डिजिटल अंधेरा' फैलता है, तो समाज का एक बड़ा वर्ग मुख्यधारा से कट जाएगा।


