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यूं अलविदा कहकर तुम्हारा जाना किसी को रास ना आया।
( लेखक-जगदीश शुक्ला ) आज से 2 वर्ष पूर्व का वह दिन सचमुच बहुत मनहूस साबित हुआ जब सदैव छोटी बहन की तरह स्नेह मान सम्मान लुटाने वाली सब पर समान रूप से ममता बिखराने वाली ममता ज़िन्दगी का खूबसूरत मोड़ आने से पहले ही हम सभी को अलविदा कह गई। सिम्स अस्पताल के आई.सी.यू.वार्ड के पलंग पर लेटा ईश्वर से खुद के सेहतमंद होने की प्रार्थना कर रहा था। इस मनहूस खबर को मेरी सेहत बिगड़ने के डर से सभी छिपाते रहे। मेरी सेहत देखने के लिए आने वालों का मैं चेहरा पढ़ने की कोशिश करता सभी के चेहरे पर एक अंजाने विषाद की गहरी परत साफ नजर आ रही थी,मेरे सामने आने वाला हर चेहरा मुझे किसी अनहोनी या गहरे राज़ को दिल में जज्ब किये लगा। कोई कुछ बोलने को तैयार नहीं जैसे सबके होंठ सिल दिए गए हों। मेरा दिल निरंतर बेचैन था। मेरी सेहत और बिगड़ने के डर एवं काफी मिन्नतों के बाद सिर्फ एक कॉल करने की शर्त पर मेरी बेटी नम्रता शुक्ला ने मुझे मोबाइल उपलब्ध कराया। मैंने अपना पहला कॉल अपने अजीज मित्र मुन्नालाल यादव को लगाया। अवसाद की गहरी कालिमा से घिरे मुन्ना लाल यादव की जुबां कुछ कह पाती उससे पहले वह भावुक हो कर रो पड़े। बस इतना ही समझ सका कि *नीरज शर्मा एसडीओ साहब की दुनिया उजड़ गई। उनकी सह हार्मनी धर्मिणी श्रीमती ममता शर्मा इस दुनिया से कूच कर गई हैं*।सुनते ही दिल धक कर रह गया। मेरा मन इस दुखद खबर को स्वीकार करने को तैयार नहीं था,अवसाद के आंसू उमड़ने को होते तब तक मेरा मन प्रतिवाद करने लगता नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता। दूसरों को जीवन का हौसला बख्शने वाली ममता यूं अचानक दुनिया से रुखसत नहीं हो सकती। पत्रकार साथियों से हुई बातचीत ने जब इस अनहोनी सी खबर पर मोहर लगा दी तब मजबूरन दिल ने इस ट्रेजिक एण्ड स्टोरी को स्वीकार करना पड़ा। सच आखिर सच होता है वही सच्चाई अन्य सभी की तरह मुझे भी स्वीकार करनी पड़ी। ममता इस दुनिया के रंग मंच पर एक आत्मीय बहन,कलेजे के टुकड़ा जैसी बेटी, ममतामई मां का किरदार कुशलता एवं क्षमता पूर्वक निबाहकर हम सब से दूर कभी न मिलने की शपथ लेकर अपनी अनंत यात्रा पर जा चुकी है। मन में रह-रहकर ममता की उन्मुक्त खिल-खिलाहट तो कभी चेहरे पर चिंतन की गहरी रेखाएं तो कभी बुजुर्गों जैसी डांट-डपट अपनों जैसी मनुहार सभी मुद्राएं अतीत के चलचित्र की तरह दिलों दिमाग पर तैरने लगीं। मुझे इस बात की हैरानी हो रही थी ममता को आखिर जाने की इतनी जल्दी क्यों हुई। ममता के व्यवहार का आत्मीय चित्रण चंद वर्षों के उनके आत्मीय सानिध्य का परिणाम था। मैंने एक बड़े भाई की तरह उनके हर रूप को देखा था। ममता एक कुशल गृहिणी के साथ सफल पत्नी बच्चों की परवरिश करने वाली कुशल मां,बेटी हर किरदार को उन्होंने बखूबी निभाया। उच्च शिक्षित होने के बावजूद अपनी परम्पराओं अपनी मांटी को पूरा सम्मान ही नहीं देना अपित यू उन्हें संस्थापित करने के लिए पूरी क्षमताओं के साथ जुट जाना कोई उनसे सीखे। अपने अंदाज में जीवन जीना कोई उनसे सीखे। यही बजह रही कि ममता अपने अल्प सानिध्य में हर किसी से आत्मीय रिश्ते बनाने में माहिर थीं। उनके जाने के बाद हम सभी के जीवन में एक रिक्तता का आ गई है,जो आगामी समय में पूरा हो पाना नामुमकिन है। श्रीमती ममता शर्मा का किरदार उनके साहित्यिक योगदान एवं लेखन के जिक्र के बगैर पूरा नहीं हो सकता। उनका लिखने का दार्शनिक जैसा अंदाज अपने आप में निराला था। अपनी अभिव्यक्ति को शब्द देते हुए बे कभी-कभी भविष्य वक्ता अथवा किसी दार्शनिक जैसी लगती थी। उनके चिंतन में शब्दों के माध्यम से अपनी मुक्त हंसी बिखेरने की अद्भुत क्षमता थी, तू कभी उनकी चंद पंक्तियां आंखों को डर करने के लिए पर्याप्त थीं। ये जो घिर आया है.… बादल जैसा... नैनों की कोरों में..!!!! कैसे बांधूं??? मन के कोने ... भीगे आंचल के छोरों में...!!!



