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ऐसे प्रकट हुई थीं छठी मैया, जानिए व्रत कथा और महत्व

इंदौर।  छठ को पर्व नहीं बल्कि महापर्व कहा जाता है। यह त्योहार उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस साल छठ का महापर्व 17 नवंबर से शुरू हो गया है और इसका आखिरी दिन 20 नवंबर होगा। आज हम आपको छठी मैया के बारे में बताएंगे। छठ व्रत सबसे कठिन व्रतों में से एक माना जाता है। महिलाएं अपने बच्चों और परिवार की लंबी उम्र के लिए 36 घंटे का व्रत रखती हैं। 36 घंटे का व्रत रखने वाले व्यक्ति की संतान की रक्षा स्वयं भगवान सूर्य करते हैं।

क्यों की जाती है छठ पूजा?

छठ में छठी मैया और सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, छठी मैया को भगवान सूर्य की बहन और ब्रह्मदेव की मानस पुत्री कहा जाता है। कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मदेव सृष्टि की रचना कर रहे थे, तो उन्होंने खुद को दो हिस्सों में बांट दिया। एक भाग को पुरुष के रूप में और दूसरे भाग को प्रकृति के रूप में विभाजित किया गया। इसके बाद प्रकृति को 6 भागों में बांट दिया गया, जिसमें छठा भाग छठी मैया थीं। भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र कार्तिकेय को पौराणिक कथाओं में छठी मैया के पति बताया गया है।

छठ पूजा महत्व

धर्म ग्रंथों के अनुसार सतयुग में प्रियव्रत नाम के एक महान राजा थे। वह सदैव धर्म के अनुसार, अपनी प्रजा का ध्यान रखता था। उनके राज्य में कोई भी असंतुष्ट नहीं था। उनकी समस्या यह थी कि उनके कोई संतान नहीं थी। तब महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराया, जिससे रानी गर्भवती हो गयी। जब राजा ने यह सुना तो वह बहुत प्रसन्न हुआ और संतान के जन्म की प्रतीक्षा करने लगा। नियत समय पर रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया, लेकिन वह पहले ही मर चुका था।

यह देखकर राजा प्रियव्रत को बहुत दुख हुआ। जब राजा प्रियव्रत मृत बालक को लेकर श्मशान गए, तो पीड़ा के कारण उन्होंने भी आत्महत्या करने की कोशिश की। उसी समय षष्ठी देवी वहां प्रकट हुईं। षष्ठी देवी ने राजा से कहा, “आप मेरी पूजा करें और अन्य लोगों से भी मेरी पूजा कराएं।” ऐसा कहकर देवी षष्ठी ने राजा के मृत पुत्र को उठाकर जीवित कर दिया। राजा ने बड़े उत्साह से देवी षष्ठी की पूजा की। तभी से षष्ठी देवी/छठी मैया का व्रत प्रारम्भ हुआ।

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