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मध्यप्रदेश

‘चंद्रकांता’ में क्रूर सिंह का किरदार निभाने के बाद टूट गए थे कई रिश्ते – अखिलेंद्र मिश्रा

उत्तर- मेरे पिता जी की सरकारी नौकरी थी और हम उन्हीं के साथ रहते थे। दशहरा की छुट्टी में अपने गांव गोल्हुआ (जिला सिवान, बिहार) जाया करते थे। वहां दुर्गा पूजा के मौके पर नाटकों का मंचन होता था। मैं गांव में था और भोजपुरी नाटक गमना की रात तैयारी चल रही थी। यह नाटक बाल विवाह पर था और हीरो के रूप में एक बाल कलाकार की जरूरत थी। निर्देशक ने मुझे देखा तो नाटक में काम करने प्रास्तव दिया, जिसे मैंने स्वीकार कर लिया। काम पंसद आया तो मेरा विश्वास बढ़ा। इसके बाद मैं स्कूल और इसके बाद कालेज में भी नाटक करने लगा।

प्रश्न- अभिनेता बनने की राह कैसे आसान हुई?

उत्तर- मैं पढ़े-लिखे ब्राह्मण परिवार से था। पढ़ाई में तेज तो नहीं था, लेकिन जो पढ़ता था, वही परीक्षा में आ जाने के कारण अच्छे अंकों से पास हो जाता था। मेरे घरवाले मुझे इंजीनियर बनाना चाहते थे, लेकिन मैं पालिटेक्निक की प्रवेश परीक्षा तक नहीं निकाल पाया। इसके बाद मैंने बीएससी आनर्स और एमएसी किया। यह करने के बाद जब करियर की बारी आई तो मैंने घरवालों से कहा कि मैं एक्टर बनना चाहता हूं। बड़े-मनौव्वल के बाद मेरे स्वजन तैयार हो गए और मैंने मुंबई का रुख किया।

प्रश्न- चंद्रकांता सीरियल में क्रूर सिंह का किरदार कैसे मिला?

उत्तर- मुंबई जाकर इप्टा और पृथ्वी थियेटर से जुड़कर नाटक करने लगा। पैसे तो नहीं मिलते थे पर काम करने में खूब मजा आ रहा था। थियेटर में अब मेरा नाम भी होने लगा था। मार्च 1994 में मुझे मेरे साथी कलाकारों ने बताया कि ‘चंद्रकांता की कास्टिंग के लिए निर्देशक नीरजा गुलेरी दिल्ली से मुंबई आई हुई हैं। उन्होंने मुझे याद किया है। मैं उनके पास गया तो उन्होंने पूछा कि आपने ‘चंद्रकांता संतति पढ़ा’ है। मैंने कहा कि पढ़ा तो नहीं, पर उपन्यास के बारे में सुना काफी है। उन्होंने मेरे सामने क्रूर सिंह के निगेटिव किरदार का प्रस्ताव रखा और मैंने हामी भर दी। इसमें यक्क के तकिया कलाम का सुझाव मेरा था। मैंने सीरियल में यक्क का नौ रसों में प्रयोग किया और इसे पसंद भी खूब किया गया। चंद्राकांता से मुझे अपार लोकप्रियता मिली। चंद्रकांता के किसी एपिसोड में यदि मैं नहीं होता था तो दूरदर्शन में लाखों पत्र आ जाते थे।

प्रश्न- चंद्रकांता सीरियल अचानक बंद क्यों हो गया था?

उत्तर- दूरदर्शन और सीरियल की निर्देशिका नीरजा गुरेली के बीच कुछ ऐसा हुआ था, जिसके कारण नाटक अचानक बंद हो गया। इससे ज्यादा जानकारी मुझे भी नहीं है। पहले लगा था कि इसका प्रसारण फिर से शुरू होगा, पर ऐसा हुआ नहीं। हम तो कलाकार हैं, एक प्रोजेक्ट बंद हुआ तो दूसरे की ओर बढ़ गए। चंद्रकांता से पूर्व में डीडी वन के सीरियल उड़ान में भी काम किया था।

प्रश्न- चंद्राकांता और उड़ान जैसे नाटक अब क्यों नहीं बन रहे?

उत्तर- भारत कथाओं का देश है। यहां हर क्षेत्र में कहानियां बिखरी पड़ी हैं, लेकिन बालीवुड और टीवी इंडस्ट्री साहित्य से कट चुकी है। वे नया कंटेट परोस रहे हैं, जिसकी आत्मा साहित्य से पूरी तरह भिन्न है। उसमें अश्लीलता की भरमार है। मैं इंडस्ट्री की हवा के साथ नहीं हूं। ऐसा कोई किरदार नहीं करता हूं, जिसमें अश्लीलता और गाली-गलौज हो। इसीलिए मैंने वेबसीरीज नहीं की। पहली फिल्म वीरगति से लेकर अब करीब 50 फिल्में कर चुका हूं, लेकिन कोई किरदार आपत्तिजनक नहीं मिलेगा।

प्रश्न- वर्तमान और आगामी प्रोजेक्ट के बारे में बताएं?

उत्तर- भोपाल में इन दिनों 4 प्रोडक्शन की फिल्म की शूटिंग के लिए आया हुआ हूं। भोपाल और आसपास के क्षेत्र में मेरा शूट करीब एक महीने का है। इसके पूर्व इंडियन टू, पीएमटी कोचिंग, गुलगुले पखावड़ी की शूटिंग पूरी कर चुका है, जो जल्द ही रिलीज होंगी। मुंबई समेत देशभर में रंगमंच कर रहा हूं। स्वामी विवेकानंद का पुनर्पाठ नाटक तैयार किया है, जिसका मंचन आगामी दिनों में भोपाल में भी होगा। मुझे सबसे ज्यादा मजा रंगकर्म में आता है। इसके साथ लेखन भी आरंभ कर दिया है।

प्रश्न- बालीवुड में भाग्य आजमाने वाले नए कलाकारों को क्या संदेश है?

उत्तर- रंगकर्म, टीवी इंडस्ट्री और बालीवुड में करियर के अपार अवसर हैं। जो लोग इस क्षेत्र में जाना चाहते हैं, पहले खुद को पहचानें और भाषा पर पकड़ बनाएं। अभिनय की आत्मा थियेटर ही है। पहले थियेटर में मंझ गए तो कहीं भी असफल नहीं हो सकते।ओटीटी और इंटरनेट मीडिया के आने के बाद कला प्रदर्शन के मंचों की कमी नहीं है।

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