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मध्यप्रदेश

नगरीय प्रशासन विभाग का कारनामा, 38 करोड़ की लो फ्लोर बसों पर 50 करोड़ की सबसिडी

भोपाल। देशभर में सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन राजधानी में इसकी आड़ में बड़ा घोटाला किए जाने की तैयारी है जिसकी शुरुआत हो चुकी है। राजधानी में संचालन के लिए 150 लो फ्लोर बसें खरीदने नगरीय विकास एवं आवास विभाग की ओर से 15 करोड़ की वीजीएफ ( वाइविलिटी गेप फंडिग) सबसिडी जारी की गई। अधिकतम तय मान 40 प्रतिशत सबसिडी के बाद किसी तरह का अतिरिक्त भुगतान नहीं करना था, लेकिन बस कंपनी को संचालन में घाटा होने और टिकट काटने वाली एजेंसी द्वारा उसकी पूर्ति नहीं कर पाने का हवाला देकर नगरीय विकास एवं आवास विभाग ने पांच करोड़ रुपये का वीजीएफ और दे दिया। इतना ही नहीं, सात वर्षों तक प्रतिवर्ष पांच-पांच करोड़ देकर कुल 35 करोड़ देने का प्रविधान भी किया जा रहा है। इस तरह मात्र 38 करोड़ की लो फ्लोर बसों के लिए 50 करोड़ रुपये की सबसिडी चुकाने की तैयारी है जो अधिकतम सीमा 40 के बजाए 142 प्रतिशत होगी।

टिकटिंग एजेंसी को देने थे रुपये

सरकारी कंपनी बीसीएलएल (भोपाल सिटी लिंक लिमटेड) ने शहर में लो फ्लोर संचालन के लिए एनआइटी 121 एवं यात्रियों से टिकट की राशि वसूलने के लिए एनआइटी 122 क्रम से दो टेंडर जारी किए। दोनों टेंडर अलग-अलग एजेंसियों को दिए गए। नगरीय प्रशासन संचालनालय का काम टिकटिंग एजेंसी से राशि लेकर संचालन करने वाली कंपनी को दिलवाने का था। इसमें आपसी सहमति से दोनों कंपनियों को काम करना था। सरकार को कोई भुगतान नहीं करना था। दोनों टेंडर में अलग-अलग शर्तें रखी गई। शर्तों के अनुसार एक साल में संचालन कंपनी मां एसोसिएट्स की रनिंग कास्ट 31 से बढ़कर 40 रुपये प्रति किलोमीटर पहुंच गई, जबकि टिकटिंग एजेंसी चलो मोबेलिटी द्वारा दिए जाने वाले रुपए 31.10 रुपये से बढ़कर 32.5 रुपये प्रति किलोमीटर ही हुए। इस तरह प्रति किलोमीटर प्राप्ति और भुगतान में आठ रुपये का अंतर आ गया। नगरीय प्रशासन ने इस अंतर से बनने वाली करोड़ों की राशि खुद की जेब से भरने का निर्णय ले लिया।

पहली बार ऐसा भुगतान

नगरीय प्रशासन संचालनालय द्वारा बीसीएलएल के माध्यम से 2013 सालों से शहर में लो फ्लोर बसों का संचालन कराया जा रहा है। लेकिन एक दशक में वीजीएफ हमेशा बसों की लागत का अधिकतम 40 प्रतिशत ही दिया गया। घाटा होने पर उसका वहन संचालन कंपनियों को खुद करना होता। पहली बार नियमों का पेंच घुमाकर 35 करोड़ की बड़ी राशि निजी कंपनी को खैरात के रूप में बांटी जा रही है।

लागत से अधिक वीजीएफ का कारनामा

अधिकारी संचालन कंपनी को नियमानुसार वीजीएफ देने की बात कह रहे हैं, लेकिन किसी भी नियम से 40 प्रतिशत से अधिक वीजीएफ नहीं दिया जा सकता। संचालन के लिए खरीदी गईं 150 लो फ्लोर बसों की प्रतिबस 25 लाख के मान से कुल 38 करोड़ रुपये है। इन बसों पर 15 करोड़ का वीजीएफ दिया जा चुका है, जो 40 प्रतिशत हो गया है। अब पांच करोड़ प्रतिवर्ष से 35 करोड़ और देने शुरू कर दिए गए है। इस तरह कंपनी के स्वामित्व वाली मात्र 38 करोड़ की बसों पर 50 करोड़ वीजीएफ खैरात दे दी जाएगी, जो 40 के बजाए 142 प्रतिशत होगी।

यह राशि जो कंपनी को दी जा रही है, वह वीजीएफ का पैसा है। इसे संचालन के अनुसार किस्तों में दिया जाएगा। सभी भुगतान नियमानुसार किए जा रहे हैं।

– भरत यादव, आयुक्त, नगरीय प्रशासन एवं आवास विभाग

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