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मध्यप्रदेश

19 महीने से कृषि उपज मंडी में कर्मचारियों को नहीं मिला वेतन अफसरशाही से व्यवस्था हुई चौपट

मुरैना। जिले की अधिकांश कृषि उपज मंडियों की हालत खराब है। बानमोर व पोरसा की कृषि उपज मंडी लगभग बंद हो गई है, तो अंबाह, जौरा सहित कई कृषि उपज मंडी में कर्मचारियों को वेतन नहीं बंट पा रहा है। किसी मंडी में सात महीने तो किसी में 19 महीने से कर्मचारी बिना वेतन के काम कर रहे हैं। जिला मुख्यालय की कृषि उपज मंडी में किसानों से तौल में ठगी व विवाद की घटनाएं बढ़ रही हैं।

पोरसा कृषि उपज मंडी, जिसमें तीन साल पहले तक हर दिन 200 से 250 किसान फसल बेचने आते थे, लेकिन अब इस मंडी में एक भी किसान उपज लेकर नहीं आ रहा है। ऐसी ही हालत बानमोर कृषि उपज मंडी की है। करीब डेढ़ साल से बानमोर मंडी में खरीदी नहीं हो पा रही है।

मंडी की आमदनी नहीं होने से बनमोर कृषि उपज मंडी के आधा दर्जन कर्मचारियाें को जनवरी 2022 यानी 19 महीने से वेतन भी नहीं मिला है। जौरा कृषि उपज मंडी से भी किसानों का मोहभंग हो गया। फसल की खरीदी नहीं होने से मंडी के खर्च तक नहीं निकल रहे, इस कारण मंडी के सचिव सहित 11 कर्मचारियों काे वेतन नहीं मिला है।

10 माह से कर्मचारियों को नहीं मिला वेतन

जिला मुख्यालय के बाद जिले की सबसे बड़ी मंडी में शामिल अंबाह कृषि उपज मंडी की आमदनी बीते तीन साल से लगातार कम होती जा रही है। अंबाह मंडी के दो दर्जन से ज्यादा कर्मचारियों को हर महीने साढ़े तीन लाख का वेतन बंटता है। बीते 10 माह से इस कृषि उपज मंडी की हालत इतनी बदहाल है कि कर्मचारियों वेतन तक नहीं मिल सका है। सबलगढ़ और कैलारस कृषि मंडियों की भी हालत ऐसी ही है। जिले की अधिकांश मंडियों में किसानाें को दी जाने वाली कैंटीन जैसी सुविधा भी बंद हो गई, अब पीने के पानी तक को किसान परेशान होते दिखते हैं।

मंडियों की हालत इसलिए हो रही खराब

जिले में सरसों, गेहूं, बाजरा यानी हर फसल का रकबा हर साल बढ़ रहा है। बीते दो साल से समर्थन मूल्य पर बाजरा का एक दाना नहीं बिना। सरसाें, गेहूं के दाम भी समर्थन मूल्य की तुलना में बाजार में ज्यादा रहे हैं। यानी किसानों की अधिकांश फसल व्यापारियों को बिकी है।

नियमानुसार गल्ला खरीदने वाले हर व्यवसायी को मंडी में किसान का अनाज खरीदना चाहिए। इस पर मंडी व्यापारी से टैक्स लेती है, किसान को सही दाम मिलता है, लेकिन हो यह रहा है कि अंबाह, पोरसा, बानमोर, कैलारस, जौरा और सबलगढ़ में मंडी के बाहर किसानों की उपज खरीदी जा रही है। इसे मंडी टैक्स की चोरी कहा जाता है। इसकी मॉनीटरिंग का जिम्मा मंडी व स्थानीय प्रशासन का होता है, लेकिन जिम्मेदार अफसर तमाशबीन बने हुए हैं।

11 साल से नहीं हुए मंडी समितियों के चुनाव

मुरैना सहित पूरे प्रदेश में कृषि उपज मंडियाें के चुनाव अंतिम बार 2013 में हुए थे। हर छह साल में होने वाले मंडी समिति के चुनावों को 11 साल से ज्यादा हो गए, लेकिन सरकार चुनाव कराना भूल गई। चुनाव होने पर मंडी अध्यक्ष व पूरा बोर्ड चुना जाता था, जिसकी निगरानी में मंडी की व्यवस्था रहती थी, लेकिन बिना चुनाव के मंडियों की कमान एसडीएम या फिर तहसीलदार स्तर के अधिकारी के हाथों में सौंप दी, लेकिन यह अफसर मंडियों की ओर कभी ध्यान ही नहीं देते, इसी कारण मंडियों की दशा बिगड़ती चली गई। पहले जब मंडी अध्यक्ष व डायरेक्टर होते थे, तो दो से तीन महीने में बैठक होती, उसमें मंडी के काम की समीक्षा, व्यापारी व किसानाें की समस्याओं को रखकर उनका निदान होता था। अब ऐसा कुछ नहीं हो रहा है।

सांठगांठ से हो रही मंडी की चोरी

अधिकांश किसान व्यापारियाें को अपनी फसलें बेच रहे हैं। समर्थन मूल्य पर खरीदी हो नहीं रही। ऐसे में मंडी को मिलने वाले टैक्स की इनकम तो बढ़नी चाहिए, लेकिन मंडियों में कर्मचारियाें का वेतन नहीं बंट रहा, मतलब बहुत बड़ी गड़बड़ है। सांठगांठ से मंडी टैक्स की चोरी हो रही है। पहले जब मंडी में बोर्ड होता था, तब ऐसी गड़बड़ियां नहीं होती थीं, मंडी की आय अच्छी होती थी। इस पर सरकार को ध्यान देना चाहिए और मंडी के चुनाव भी जल्द करवाए जाएं, जिससे स्थिति सुधरे।

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