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मध्यप्रदेश

हाई कोर्ट ने दिव्यांगों के प्रति शासन-प्रशासन के उदासीन रवैये पर बरती सख्ती

जबलपुर। हाई कोर्ट ने दिव्यांगों के प्रति शासन-प्रशासन के उदासीन रवैये पर सख्ती बरतते हुए जोरदार फटकार लगाई। यही नहीं दिव्यांगों के बैकलाग पदों पर नियुक्ति के संबंध में पूर्व आदेश का पालन न करने पर 50 हजार रुपये का जुर्माना भी लगा दिया। यह राशि सात दिन के भीतर हाई कोर्ट लीगल सर्विस कमेटी में जमा करने के निर्देश दिए गए हैं। न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल की एकलपीठ ने साफ किया है कि अगली सुनवाई तक पूर्व आदेश का पालन नहीं किया तो सामान्य प्रशासन विभाग के प्रमुख सचिव को स्वयं हाजिर होकर स्पष्टीकरण देना हाेगा।

राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ ने उठाया था मामला

दरअसल, राष्ट्रीय दृष्टिहीन संघ की मप्र शाखा ने वर्ष 2019 में हाई कोर्ट में दिव्यांग जनों के आरक्षण का मामला उठाया था। हाई कोर्ट ने 10 फरवरी 2023 को शासन को यह बताने कहा था कि दिव्यांगों की श्रेणी में अब तक कितने पद भरे गए हैं और कितने पद रिक्त पड़े हैं। दिव्यांगता अधिनियम के तहत कितने पद आगे बढ़ाए गए हैं। कोर्ट ने उन सभी विज्ञापनों की विस्तृत जानकारी पेश करने के निर्देश दिए थे जो बैकलाग पद भरने के लिए जारी किए गए थे। इसके अलावा हाई कोर्ट ने सभी कैडर के पदों की संख्या, आरक्षित पदों की संख्या और भरे गए पदों की संख्या के संबंध में जानकारी पेश करने कहा था। हाई कोर्ट ने राज्य शासन सरकार से यह भी पूछा था कि रिक्त पदों को भरने के क्या प्रयास किए गए। कोर्ट ने इसके लिए छह सप्ताह की मोहलत दी थी।

सुप्रीम कोर्ट के निर्णय नहीं मान रही सरकार

मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली के वरिष्ठ अधिवक्ता एसके रुंगटा वर्चुअल रूप से हाजिर हुए। उन्होंने दलील दी कि राज्य शासन ने कोई जवाब पेश नहीं किया है। शासन की ओर से शासकीय अधिवक्ता मानसमणि वर्मा ने कोर्ट को अवगत कराया कि सामान्य प्रशासन विभाग ने सभी विभागों को 28 अप्रैल और 22 मई को पोर्टल पर जानकारी उपलब्ध कराने कहा गया था। उन्होंने बताया कि 13 विभागों की जानकारी आना बाकी है। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर करते हुए कहा कि दिव्यांगों के कल्याण के प्रति शासकीय अधिकारियों के उदासीन रवैया इस वर्ग के लोगों में अविश्वास जगाता है। हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार दिव्यांगों के लिए बने अधिनियमों में दिए प्रविधानों का पालन नहीं कर रही हैं। इतना ही नहीं सुप्रीम कोर्ट व हाई कोर्ट के निर्णय भी सरकार नहीं मान रही है। यह रवैया आपत्तिजनक है।

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