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सूख गई वो जीवन धारा नदियाँ भारतवर्ष की – आनंद सिकरवार

सूख गई वो जीवन धारा नदियाँ भारतवर्ष की परंपरा हैं द्य नदियांए नदी घाटी सभ्यता से लेकर आज तक भारत को पोषित करती रही हैं और भविष्य में भी करती रहेंगी द्य विश्व की बड़ी.बड़ी सभ्यताएँ नदियों के किनारे ही पनपी हैं द्य सिंधु सभ्यता से लेकर आधुनिक सभ्यता तक मानव जाति नदियों की ऋणी है द्य इस बात को झुठलाया नहीं जासकता कि नदियाँ न होती तो जीवन का कोई भी स्वरूप अपने उच्चतम स्तर तक न पहुँच पाता द्य मेरे अपने देश की बात करता हूँ जहाँ अनेक नदियाँ जीवन धारा बन कर बह रही हैं तथा धरा को सींच रही हैं द्य यही कारण हैएकि मेरे देश में नदियों को माँ कह कर पुकारा जाता है द्य और गर्व के साथ माँ गंगा गीत गाती हैए मानो तो मैं गंगा माँ हूँ३ण्ण् क्योंकि हम मानते हैं गंगा माँ है द्य ये अंतरात्मा को स्पर्ष करने वाले भाव हैं द्य गंगा तेरा पानी अमृत३ण्ण्ण्! सच में है !! कहा जाता है कि अमृत की एक बूँद मानव को अमर कर सकती है द्य कितना अमृत माँ गंगा ने भारत भूमि को पिलाया है ! तब क्या इस अमर भूमि को कोई मिटा सकता है घ् भारत अमर हैय अपराजेय हैय अदम्य साहस का धनी हैय तो इन्हीं अमर धाराओं के कारण द्य इन नदियों के तट पर हमारे परमात्मा ने विविध रूप धारण कर अनेक लीलाओं का सृजन किया है द्य राम की सरयूए कृष्ण की यमुना और शिव की गंगा कितनी पावन नदियाँ हैं द्य इन नदियों की कल.कल करती बहती जल धारा के कारण ही अयोध्याए मथुराए और काशी जैसे धर्म स्थल अपने पौराणिक असितित्व में आज भी जस के तस हैं द्य उपरोक्त वर्णन उस गाथा की भूमिका है जो मैं आपको सुनाना चाहता हूँ द्य बागचीनीए मुरैना जिले का एक सुन्दर एवम् सुहावना ग्राम्य स्थल हैए जो अपने नाम के साथ ही चीनी की मिठास लिए हुए है द्य यह गाँव कभी एक कम्यूनिटी ड्वेलिंग ;सामुदायिक आवासद्ध की तरह बसा हुआ था ए जहाँ सभी तथाकथित जातियाँ एक साथ परंतु विविध समूहों में रहा करती थीं द्य गाँव में जो मुहल्ले थे उनके नाम वहाँ रहने वाली जातियों के नाम पर ही रखे गए थे द्य उस समय वस्तु विनिमय ;ठ।त्ज्म्त् ैल्ैज्म्डद्ध एक मायने में जीवित था द्य जातियाँ कर्म के आधार पर विभाजित थीं द्य एक प्रकार का कार्य एक ही जाति करती थी और वह जाति उस कार्य विशेष में निपुण होती थी द्य इनके कार्य के बदले हर फसल के आने पर अनाज और भूषे के रूप में भुगतान किया जाता था द्य आवस्यकताएं सीमित थी इसलिए सभी लोग सुखमय जीवनजीते थे द्य चूँकि सब के पास सबकुछ नहीं था इस लिए सभी एक दूसरे की सहायता के लिए तत्पर रहते थे द्य मेरा जन्म एक संक्रमण काल में हुआ है जब पुरातन परंपराएं अतीत होरहीं थीं और आधुनिक परंपराएं अपना स्वरूप धारण कर रही थीं द्य इसलिए मुझे मेरे गाँव की बहुत सी बातें याद हैं द्य मेरा घर गाँव के बाजार में स्थित है जिसे हनुमान चौराहा कहा जाता है द्य बजरंग बली घर के सामने ही प्रतिस्थापित हैं द्य मेरे बचपन में मंदिर के चहुं ओर एक साप्ताहिक बाजार लगता था । इस बाजार में सभी तरह की वस्तुएं मिला करती थीं । लोग सप्ताह भर बाजार के लगने का इंतजार करते थे। बैल गाड़ियों का जमघट सुबह से ही देखने लगता था द्य साथ ही मंगल बार के दिन शासकीय माण् विण् प्रांगण में पशु हाट लगा करती थी। ये सब अब कहानियों और फिल्मों की बातें बन कर रह गई हैं। आधुनिकता की चकाचोंध ने सभी पुरानी परम्पराओं की चमक धूमिल कर दी है । लोगों में आपसदारी नहीं रही । भाईयों में भाईचारा नहीं रहा । ग्रामीण जीवन अब अव्यवस्थित होगया है द्य बात नदियों की चल रही है द्य बागचीनी कुंआरी नदी के दाँए तट पर बसा है द्य कुंआरी नदी का उद्गम स्थल मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में शिवपुरी पठार के पास बैराड़ नामक स्थान पर स्थित है। यह नदी शिवपुरी जिले के देवगढ़ के उत्तर.पूर्वी पठार से निकली है तथा पूर्व दिशा में चंबल नदी के समांतर बहती है। कुंवारी नदी सिन्ध नदी की एक उपनदी हैए जो स्वयं यमुना नदी की उपनदी हैए उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में कई नदियाँ पचनदा नामक स्थान पर यमुना में विलीन हो जाती हैं द्य और यहां से यमुना बन कर बहती हैं तथा प्रयाग राज में संगम स्थल पर पहुँच कर गंगा बन जाती हैं द्य दादी बताया करती थीं कि एक समय ऐसा भी था जब गाँव के आस.पास पीने के पानी की उपलब्धता बहुत कम थी द्य लोग रात के अंधेरे में नदी किनारे गड्ढे खोद दिया करते थे जिनमें झरने की तरह बहुत ही धीमी रफ्तार से पानी इकट्ठा होता था द्य इन गड्डों को उनकी भाषा में चुइला कहते थे द्य समय बदला कुंआरी मैया की कृपा हुई और अथाह जल गाँव के समीप से धाराप्रवाह बहने लगा द्य बरसात के चार महीने नौका उत्सव के होते थे द्य गाँव में एक मल्हा परिवार था जो जाति से मल्हा नहीं थे द्य गाँव के लोगों के लिए नाव की यात्रा लगभग मुफ्त थी द्य परंतु नाव चलाने में सारा गाँव उनकी सहायता करता था द्य गाँव का लगभग हर पुरुष नाव चलाना जानता था द्य अर्थात् सारा गाँव इसी तरह एक दूसरे के काम में हाथ बंटाता था द्य समय के साथ प्रकृति में एक अद्भुत परिवर्तन हुआ द्य कुंआरी नदी के दोनों ओर लगभग 3 किण् मीण् के दायरे में भूतल से 20 से 60 फीट की गहराई तक भूजल भण्डार निर्मित हो गया द्य मानव में प्रकृति का दोहन करने की अनूठी कला है द्य उसे पता चल जाना चाहिए कि जमीन में कोई उपयोगी वस्तु उपलब्ध हैए बस लूट मचा देता है द्य जगह जगह सुश्रुत कूपों का जाल बिछ गया द्य इसमें होता ये था कि उपरोक्त वर्णित क्षेत्र में कहीं भी 3 इंच का पाइप 20 . 40 फीट की गहराई तक बोर करके फंसा दो और बिना बिजली की सहायता के लगभग एक फुट ऊँची धारा निरंतर चलती रहती थी द्य बड़ा ही सुहावना दृश्य होता था द्य वह नजारा आज भी आँखों के आगे हमेशा जीवित रहता है द्य परंतु इसका परिणाम ये हुआ कि सुश्रुत कूप तो सूखे ही साथ ही जो प्राचीन प्रणाली के कुंए थे भू जल स्तर गिरने के कारण वे भी सूख गए द्य अब हर ओर नल कूप दिखाई देते हैं द्य यदि मानव प्रकृति के दोहन की प्रवृति नहीं छोड़ेगा तो भावी पीढ़ियों को कुछ भी नहीं देपाएगा द्य इतिहास उसे लानत भेजेगा द्य फिर से इन नदियों के किनारे बसे लोग दादी वाले चुइला युग में चले जाएंगे द्य आनंद सिकरवार

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