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उत्तरप्रदेश

पहलवानी, टीचिंग और फिर राजनीति, साइकिल से किया चुनाव प्रचार और इसी को बनाया सिंबल

लखनऊ: समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव का सोमवार को निधन हो गया। कभी पहलवानी, उसके बाद टीचिंग के पेशे में आने वाले मुलायम सिंह यादव ने जीवन में कई तरह की मुश्किलें देखीं। वह कई दलों में शामिल रहे और बड़े नेताओं की शागिर्दी भी की। इसके बाद उन्होंने अपना दल बनाया और एक दो बार नहीं बल्कि यूपी में तीन बार सत्ता संभाली। यूपी की राजनीति जिस धर्म और जाति की प्रयोगशाला से होकर गुजरी उसके एक कर्ताधर्ता मुलायम सिंह भी रहे।साल 1960 में मुलायम राजनीति में उतरे। करीब 6 दशक से यानी 60 साल से किंग से किंग मेकर की भूमिका निभाने वाले मुलायम सिंह यादव राजनीति में अगला कौन सा कदम उठाएंगे यह जानकारी उनके बगल खड़े इंसान को भी नहीं होती थी। मुलायम सिंह यादव राजनीति में विजय होते रहे और किंग बनते रहे।28 साल की उम्र में 1967 में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (एसएसपी) के उम्मीदवार के रूप में इटावा की जसवंतनगर से पहली बार विधायक चुने गए थे। 80 के दशक में मुलायम सिंह लखनऊ में अक्सर साइकिल की सवारी करते हुए नजर आ जाते थे। कई बार वह साइकिल पर सवार होकर न्यूज-पेपरों के ऑफिस भी पहुंच जाते थे।चलिए…12 तस्वीरों में देखिए मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर…यह तस्वीर मुलायम सिंह यादव की 1955 की बताई जाती है। तब मुलायम सिंह यादव मैनपुरी के जैन इंटर कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर कार्यरत थे।सैफई में जन्मे: इटावा जिले के सैफई गांव में 22 नवंबर 1939 को जन्मे मुलायम सिंह यादव ने साधारण परिवार से निकलकर प्रदेश और फिर केंद्र की राजनीति तक का सफर तय किया गया। जनता के बीच किसान नेता, नेता जी और धरतीपुत्र जैसे नामों से प्रसिद्ध मुलायम सिंह यादव ने दो शादियां की।यह तस्वीर मुलायम सिंह यादव और उनकी पहली पत्नी मालती देवी की है।मुलायम सिंह यादव की पहली शादी मालती देवी से हुई थी। 1973 में अखिलेश यादव के जन्म के बाद मालती गंभीर बीमार हो गईं थी। 27 मई 2003 को लंबी बीमारी के बाद उनका निधन हो गया।यह तस्वीर साधना गुप्ता के साथ की है। 1980 के दशक में साधना गुप्ता मुलायम के करीब आईं थी।मुलायम अपनी मां मूर्ति देवी के साथ। 1967 में 28 साल की कम उम्र में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी से पहली बार जसवंत नगर विधानसभा से सदस्य चुने गए।यह तस्वीर पार्टी स्थापना के पहले अधिवेशन की है। जिसमें मुलायम सिंह यादव समेत अन्य नेता मौजूद रहे।मुलायम साल 1977 में पहली बार राज्य मंत्री बनाए गए। साल 1980 में वह यूपी में लोक दल के अध्यक्ष भी रहे। जब लोक दल, जनता दल बन गया। तब 1982 में मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष बनाए गए।भाजपा के समर्थन से 5 दिसंबर 1989 में पहली बार मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने थे। हालांकि श्रीराम जन्म भूमि का मुद्दा चरम पर था। रथयात्रा के दौरान मुलायम सिंह से भाजपा के संबंध खराब हो गए।मुलायम सिंह ने भाजपा के रथ यात्रा को संप्रदायिक बताते हुए अयोध्या जाने से इंकार कर दिया था। 1990 में वीपी सिंह की सरकार गिर गई तब मुलायम सिंह ने जनता दल की सदस्यता ले ली और कांग्रेस के समर्थन से सीएम बने रहे।चार अक्टूबर 1992 में समाजवादी पार्टी की नींव रखी। सत्ता में काबिज होने के लिए 1993 में मुलायम सिंह यादव ने बहुजन समाज पार्टी से गठबंधन कर लिया था।1987 में चरण सिंह की मौत हो गई। लोक दल दो ग्रुपों में टूट गया। एक दल चरण सिंह के बेटे अजित सिंह के साथ चला गया। दूसरा मुलायम सिंह यादव के साथ। 1989 में मुलायम ने जनता दल के साथ नाता जोड़ लिया।साल 1996 में मुलायम सिंह यादव इटावा के मैनपुरी लोकसभा सीट से सदस्य बने और उन्हें केंद्रीय रक्षा मंत्री बनाए गए।2 साल का था मुलायम सिंह का रक्षा मंत्री का कार्यकाल, किए थे बड़े फैसलेसमाजवादी पार्टी के नेता एवं पूर्व रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव देवेगौड़ा और इन्द्र कुमार गुजराल की सरकारों में 1996 से 1998 के बीच दो साल भारत के रक्षा मंत्री रहे तब उन्होंने कई महत्वपूर्ण फैसले लिये जिसके कारण सेना ने उन्हें बेस्ट रक्षा मंत्री का ऑर्डर दिया था।उनके रक्षा मंत्री कार्यकाल में चीन हो या पाकिस्तान किसी भी देश की हिम्मत नहीं थी कि वह भारत की तरफ आँख उठाकर देख सके।पाकिस्तान ने उन दो सालों में सीजफायर नहीं किया। उन्होंने चीन की सेना को 4 किलोमीटर पीछे ढकेल दिया था।नेताजी के रक्षा मंत्री कार्यकाल में 5 सैनिक शहीद हुए थे उनके बदले में 100 को कफन पहना दिया था।खुद जाकर आदेश दिया था सीमा पर एक भी घुसपैठ नही होनी चाहिये।भारतीय वायुसेना को सबसे शक्तिशाली अत्याधुनिक सुखोई 30 Mi लड़ाकू विमान दिये।नेताजी भारत के पहले रक्षा मंत्री थे जो भारत के रक्षा मंत्री होते हुये भी सियाचिन ग्लेशियर पर गये थे।रक्षा मंत्री मुलायम सिंह ने ही नियम बनाया था कि जब भी कोई जवान सीमा पर शहीद होगा, तो डीएम, एसपी उसके घर जाएंगे।शहीद को पूरा राजकीय सम्मान मिलेगा।सीमा पर कोई शहीद होगा, तो उसका शव राजकीय सम्मान से उसके घर पहुचाया जाएगा ।जिससे उनके परिवारी जन उनका अंतिम दर्शन कर सके और शहीदों को स-सम्मान विदाई मिल सके।मुलायम सिंह यादव के रक्षा मंत्री बनने से पहले सैनिक के घर उसकी टोपी, मेडल ही जाती थी और बैरक में उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता था।यह व्यवस्था अंग्रेजों के जमाने से चली आ रही है। मुलायम सिंह यादव ने विधवाओं को पति के अंतिम दर्शन की व्यवस्था की थीसाल 2012 में उत्तर प्रदेश में हुए विधानसभा चुनाव में 403 में से 226 सीटें जीतकर मुलायम सिंह ने अपने आलोचकों को एक बार फिर करारा जवाब दिया था।मुलायम सिंह चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री पद की कमान संभालेंगे, लेकिन उन्होंने अपने बेटे अखिलेश यादव को मुख्यमंत्री बनाकर समाजवादी पार्टी की राजनीति के भविष्य को एक नई दिशा देने की पहल कर दी थी।हालांकि उनके राजनीतिक सफ़र में उनके हमसफ़र रहे उनके भाई शिवपाल यादव और चचेरे भाई राम गोपाल यादव के लिए ये फ़ैसला शायद उतना सुखद नहीं रहा होगा।खासतौर से शिवपाल यादव के लिए जो खुद को मुलायम के बाद मुख्यमंत्री पद का स्वाभाविक हक़दार मान कर चल रहे थे। लेकिन शायद यहीं समाजवादी पार्टी में उस दरार की शुरुआत हो गई थी, जिसका खाई रूप हमें आज देखने को मिल रहा है।यह तस्वीर मार्च 2017 की है। योगी आदित्यनाथ शपथ ग्रहण समारोह में पीएम मोदी से मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश यादव से मिलवाया था।

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