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छत्तीसगढ़ चुनाव : बहुमत का दावा कर रही कांग्रेस हुई पस्त, सामने आए हार के मुख्य कारण

90 सीटों वाले छत्तीसगढ़ में लगभग रिज्लट साफ हो गया है कि वहां सत्ता बदलने जा रही है। इसके साथ ही भूपेश बघेल की विदाई तय है। छत्तीसगढ़ एक ऐसा राज्य है जहां तीन महीने पहले तक खुद बीजेपी के नेता इस बात को अंदर ही अंदर स्वीकार्य कर चुके थे कि इस बार कम से कम वह सत्ता में नहीं लौट रहे हैं। कांग्रेस हर बार 75 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी। तो आइए जानते है कि कांग्रेस के सत्ता में न आने के कारण

जातीय समीकरण बिठाने में असफल

किसी भी राज्य में कोई भी तरह का चुनाव हो जातीय समीकरण का अहम रोल होता है। ओबीसी वोटर बीजेपी और कांग्रेस दोनों को ही वोट करता रहा है। लेकिन, इस बार कांग्रेस ओबीसी की अलग-अलग जातियों का समीकरण बैठाने में सफल नहीं रही। कांग्रेस का सबसे बड़ा वोट बैंक गांवों में था। कांग्रेस उसी को आधार बनाकर चुनाव लड़ रही थी। बीजेपी ने गांव और किसान के उस वोटर में बेहतर चुनावी प्रबंधन किया। कांग्रेस इन जातीय समीकरणों को बिठाने में असफल रही। जो जातियां कांग्रेस को वोट करती रहीं इस बार उससे दूर खड़ी दिखाई दीं।

भ्रष्टाचार के आरोप हुए नत्थी

कांग्रेस सत्ता में अपनी सफाई में कुछ भी कहती रहे। कोर्ट में क्या साबित हो पाए या नहीं या वक्त बताएगा लेकिन, कांग्रेस सरकार के ऊपर भष्ट्राचार के आरोप एक तरह से नत्थी हो गए। ऐन चुनाव के वक्त महादेव ऐप के प्रकरण ने भी इस धारणा की पुष्टि की। मुक्तिबोध कहते हैं कि इससे इंकार नहीं कर सकते कि भष्ट्राचार के आरोपों ने कांग्रेस का नुकसान किया।

एक-दूसरे पर बयानबाजी

कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण पीएम मोदी पर बयानबाजी करना भी रहा है। कांग्रेस के नेताओं ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टारगेट करने की विफल कोशिश की। कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर विवादित बयान दिया था। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा, “मोदी जी, झूठों के सरदार बन गए हैं।” इस तरह की बयानबाजी से पीएम मोदी को हर बार लाभ ही पहुंचा है।

गुटबाजी का असर पड़ा भारी

इस बार मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस के अंदर ही बड़ी गुटबाजी देखने को मिली. राजस्थान में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के गुटों में तकरार पहले दिन से ही उजागर थी। पूरे पांच सालों तक कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व इसे गड़बड़ी को ठीक करने में जुटा रहा। मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया के भाजपा में जाने के बाद कई छोटे नेताओं ने भी बीजेपी का दामन थाम लिया. तब से वह खाली जगह भरी नहीं गई है।

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