ब्रेकिंग
जनपद कार्यालय बना अखाड़ा! सीईओ ने तीन जनपद सदस्यों पर धमकी और अभद्रता का कराया मामला दर्ज दिल्ली के होटल में भीषण आग, 21 मौतों की खबर से हड़कंप प्यासी मुरैना और पानी में मस्ती! समर वेव वॉटर पार्क पर उठने लगे सवाल मुरैना सगाई पक्की होते ही दूल्हे पर हमला लड़की देखकर लौट रहे युवक को घेरकर बदमाशों ने पीटा, चेन-अंगू... बामौर थाना : तेज रफ्तार ट्रैक्टर ने बुजुर्ग को मारी टक्कर दिमनी थाना : जहरीला पदार्थ खाने से वृद्ध की मौत, जांच शुरू पोरसा थाना : कट्टा लेकर घूम रहे युवक को पुलिस ने दबोचा सगाई की खुशियों के बीच करोड़ों की चोरी से सनसनी बीजेपी नेता के भाई के घर दिनदहाड़े वारदात सरकारी जमीन विवाद में खूनी संघर्ष, फायरिंग में युवक की मौत, दो महिलाएं घायल मुरैना: सबलगढ़ के गुरैमा गांव में भीषण आग, ग्रामीणों की तत्परता से टला बड़ा हादसा
मध्यप्रदेश

युवा रचनाकार ही मोड़ेंगे हमारी सोच का धार-ए-रुख

भोपाल। इश्क- मोहब्बत में डूबे शेर और उर्दू साहित्य पर वरिष्ठ साहित्यकारों की राय को जानने का मौका शनिवार को गांधी भवन में मिला। मप्र उर्दू अकादमी की ओर से ‘नई हवाओं का मौजूं-ए-गुफ्तगू क्या है’ के अंतर्गत कलम से मंच तक के तहत मुशायरा और सेमिनार का आयोजन शाम को मोहनिया सभागार में किया गया।

दो सत्रों में हुआ कार्यक्रम

कार्यक्रम दो सत्रों पर आधारित था। प्रथम सत्र में सेमिनार के तहत वक्तागण के रूप में डा. मोईद रशीदी, अलीगढ़ एवं कमर जहां, बहराईच शामिल रहे। डा मोईद रशीदी ने कहा कि नई पीढ़ी ही में कोई बड़ा रचनाकार पैदा होगा, जिसके नाम से ये दौर पहचाना जाएगा। नई पीढ़ी बहुत ऊर्जा है। जरूरत इस बात की है कि वो साहित्यिक सिद्धांतों से समझौता न करे। कमर जहां ने कहा कि कानून साजी और उनको सफलता के साथ निष्पादन सरकारी विभाग के जिम्मे है, लेकिन सामाजिक स्तर पर हमारी सोच के धार-ए-रुख मोड़ने का काम हमारे रचनाकार ही कर सकते हैं। हमारे रचनाकार ऐसा साहित्य रचें, जो समाज में उपस्थित प्राचीन परंपराओं और समाज के विकास में रुकावट बनने वाले तत्वों को चिन्हित कर सके। इस सत्र का संचालन रिजवानउद्दीन फारूकी ने किया।

दूसरे सत्र में अखिल भारतीय मुशायरा आयोजित किया गया, जिसकी अध्यक्षता मोईद रशीदी ने की। कार्यक्रम के अंत में डा. नुसरत मेहदी ने सभी श्रोताओं का आभार व्यक्त किया।

इन अशआरों को मिली श्रोताओं की भरपूर सराहना

इतना आसां नहीं लफ्जों को गजल कर लेना

शोर को शेर बनाने में जिगर लगता है

– डा मोईद रशीदी, अलीगढ़

मैं तेरे ख्याब वापस कर रहा हूं

मिरी आंखों में गुंजाइश नहीं है

– अबरार काशिफ, अमरावती

सूखते पेड़ से पंछी का जुदा हो जाना

ख़ुद-परस्ती नहीं अहसान-फरामोशी है

– आशु मिश्रा, बरेली

मैं रो पड़ूंगा बहुत भींच के गले न लगा

मैं पहले जैसा नहीं हूं, किसी का दुख है मुझे

– कमर अब्बास कमर, दिल्ली

Related Articles

Back to top button