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ग्वालियर

ग्वालियर मांढरे की माता हर खतरे से पहले सिंधिया को सपने में खतरे से कर देती थीं आगाह

ग्वालियर के तात्कालिक सिंधिया शासक रोज सुबह दूरबीन से महल से ही करते थे अपनी कुलदेवी के दर्शन, सिंधिया घराने की कुलदेवी मांढरे की माता सिद्धपीठ के रूप में पूजी जाती है
ग्वालियर। इन दिनों देशभर में नवरात्रि की धूम मची हुई है लेकिन ग्वालियर की कैंसर पहाड़िया पर स्थित मांढरे की माता पर साल भर भक्तों की भीड़ लगी रहती है। सिंधिया घराने की कुलदेवी मांढरे की माता सिद्धपीठ के रूप में पूजी जाती है। मांढरे की माता की विशेष कृपा सिंधिया घराने पर मिलती है। बताया जाता है कि हर खतरे के पहले ही माता द्वारा सिंधिया घराने को सपना देकर आगाह कर दिया जाता था।
 मंदिर के पुजारी अशोकराव मांढरे के अनुसार मांढरे की माता महाकाली अष्ट भुजाधारी के रूप में यहां विराजमान है। 149 साल पहले महाराष्ट्र के सतारा से माता की मूर्ति को लाकर यहां स्थापित किया गया था। सिंधिया घराने के जयाजीराव सिंधिया ने अपने सेना के कर्नल आनंद राव मांढरे के आग्रह पर महाकाली की मूर्ति को महाराष्ट्र से लाकर ग्वालियर की कैंसर पहाड़ी पर स्थापित किया था।
 *मांढरे को महाराष्ट्र से लेकर आए थे सिंधिया*
आनंद राव महाराष्ट्र के सतारा में महाकाली की पूजा करते थे। उनकी आस्था और सेवाभाव देखकर जयाजीराव सिंधिया आनंद राव को अपने साथ ग्वालियर लेकर आऐ थे। यहां पर उन्होंने उन्हें अपने लश्कर का कर्नल नियुक्त किया । आनंद राव का लश्कर लगान वसूली का काम करता था। मांढरे, जयाजीराव सिंधिया के बेहद निष्ठावान और ईमानदार सिपेसालार थे।
*पहाड़िया पर जमीन देकर मंदिर निर्माण करवाया*
सिंधिया शासक जयाजीराव सिंधिया ने पहाड़िया पर 13 बीघा जमीन देकर मंदिर का निर्माण करवाया। अभी तक मांढरे के वंशजों द्वारा इस मंदिर की पूजा की जाती रही है। आज भी आनंद राव मांढरे के वंशज इस मंदिर में पुजारी के रूप में मौजूद हैं। आनंद राव मांढरे के वंशज और मंदिर के पुजारी बताते हैं यह माता का मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में प्रसिद्ध है यहां पर सच्चे दिल से जो मन्नत मांगी जाती है वह जरूर पूरी होती है।
*शुभ कार्य से पहले कुलदेवी के दर्शन की परंपरा*
 सिंधिया महल का द्वार और मांढरे की माता मंदिर का द्वार आमने सामने है। ऐसा बताया जाता है कि तत्कालीन सिंधिया शासक दूरबीन से प्रतिदिन मांढरे की माता के दर्शन किया करते थे। मांढरे की माता के दर्शन के बाद ही उनकी दिनचर्या की शुरुआत हुआ करती थी। मांढरे की माता सिंधिया घराने की कुलदेवी भी हैं। यही वजह है कि सिंधिया घराने द्वारा कोई भी शुभ कार्य से पहले कुलदेवी पर दर्शन करने की परंपरा है।

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