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असहमति को ‘गंध’ यानि बदबू माना जाता है, भोपाल के ‘गांधी-भवन’ में, असहमति पर इस्तीफा देने की धमकी गांधी-जीवियों की लालची तिकड़म से गांधी विचार हाशिऐ पर।

( दिनेश सिंह सिकरवार ) भोपाल – गांधी-विचार को आगे बढाने के लिए खडा किया गया भोपाल का गांधी-भवन अब गांधी की ही बुनियादी बातों से मुंह फेरता दिखाई दे रहा है। अभी हाल में हुई ‘गांधी भवन न्यास मंडल’ की बैठक में अधिकांश निर्णय सदस्यों को जबरन चुप करवाकर मनमर्जी से लिए गए हैं। जब कतिपय सदस्यों ने अपनी असहमति जाहिर करने की कोशिश की तो उन्हें कहा गया कि आपकी बात में ‘गंध’ (बदबू) आती है। ज्यादा आग्रह करने पर उनसे त्यागपत्र देने की धमकी दी गई। गौरतलब है कि स्व. श्री दादा भाई नायक एवम स्व. श्री काशीनाथ त्रिवेदी जैसे निष्ठावान गांधीवादियों ने भोपाल में गांधी के विचारों पर आधारित समाज के निर्माण के स्वप्न के साथ चार दशक पूर्व ‘गांधी भवन’ की स्थापना की थी। तत्कालीन सरकार ने इस सेवा कार्यं के लिए भोपाल के मध्य में एक भू-खंड उपलब्ध कराया था जो मध्यप्रदेश में गांधी विचार और कार्य के प्रचार-प्रसार का केंद्र बना, लेकिन अब धीरे-धीरे ‘गांधी भवन’ से गांधी कम होते जा रहे हैं, मात्र भवन रह गया है। ‘न्यासी मंडल’ की हाल की बैठक में ‘गांधी भवन न्यास’ के उन सचिव का कार्यकाल बढाना, जिन्होंने ‘न्यास मंडल’ से सहमति के बिना, अपनी मनमर्जी से मई 2020 के बाद बार-बार अपना कार्यकाल बढा लिया, इसका एक उदाहरण है। उन पर गंभीर आर्थिक अनियमितताओं, आर्थिक अपराध, गैर-कानूनी कामकाज, ‘न्यास’ के निर्णयों की गंभीर अवहेलना जैसे अनेक आरोप लगे हैं और इन्हें लेकर पुलिस, पंजीयक और बेंक में शिकायतें दर्ज हैं जिन पर जांच जारी है। सचिव पर लगे इन सार्वजनिक आरोपों और उनका कार्यकाल बढाने के बारे पूछने पर कहा गया कि आपकी बात में ‘गंध’ आती है और इसलिए आप त्यागपत्र दे दीजिए। इस तरह की अलोकतांत्रिक पद्धति गांधी के नाम पर बनी संस्था में शर्मनाक है। विडंबना यह है कि उक्त बैठक में अधिकांश सदस्यों समेत खुद अध्यक्ष भी मौजूद थे और उन्होंने इस शर्मनाक हरकत पर चुप्पी साधे रहना बेहतर समझा। ‘गांधी भवन’ की स्थापना से जुड़े सभी गांधीवादियों ने अपना पूरा जीवन गांधी के काम में लगाया, लेकिन ‘गांधी भवन’ को कभी व्यक्तिगत या पारिवारिक पोषण का केंद्र नहीं बनने दिया। इसी परम्परा को गांधीवादी स्व. एसएन सुब्बराव ने अध्यक्ष के नाते आगे बढ़ाया तथा ‘गांधी भवन’ प्रदेश और देश के लिए प्रेरणा का केंद्र रहा। गांधीवाद को मैदानी सचाई बनाने में लगे श्री राजगोपाल पीवी ने न्यासी के नाते ‘गांधी भवन’ की गरिमा बढ़ाने का काम किया। *अनियमितताओं के कुछ बिंदु* 1. सचिव महोदय का चुनाव 16 मई 2015 को ‘गांधी भवन न्यास’ की बैठक में 5 वर्ष के लिए हुआ था। इनका कार्यकाल 15 मई 2020 को समाप्त हो गया था, लेकिन इसकी सूचना किसी को नहीं दी गई और वे पूरे अधिकार के साथ काम करते रहे। इससे ‘न्यास मंडल’ एवं पदाधिकारियों के विश्वास का हनन हुआ और न्यास की वैधानिकता का पालन नहीं हुआ। 2. 14 दिसंबर 2020 को पांच न्यासियों (श्री संजय सिंह, श्री महेश सक्सेना, श्रीमती अंजू बाजपेई, श्री श्याम बोहरे एवम श्री रन सिंह परमार) का कार्यकाल समाप्त हो गया। उक्त न्यासियों को उनके कार्यकाल समाप्त होने की कोई सूचना नहीं दी गई। उनको वस्तुस्थिति से अवगत न कराकर गुमराह किया गया। 3. 28 दिसंबर 2020 को श्री राजगोपाल पीवी की अध्यक्षता में न्यास की बैठक बुलाई गई। उस बैठक में भी उन सब न्यासियों को न्यासी की हैसियत से आमंत्रित किया गया, जबकि सचिव सहित 5 न्यासियों का कार्यकाल समाप्त होने से उन सभी का न्यासी की हैसियत से बैठक में बुलाना और निर्णय करना विधान के विपरीत था। उनकी उपस्थिति विधान के प्रतिकूल थी, जिसके बारे में न्यासी अनभिज्ञ थे। 4. 25 अगस्त 2021 को अध्यक्ष के निर्देश पर न्यास मंडल की बैठक बुलाई गई थी, जिसमें पूर्व न्यासियों को न्यासी के तौर पर आमंत्रित किया गया था। इस प्रकार न्यासियों को गुमराह किया गया जो उनके लिए सम्मानजनक नहीं था। यह गैर-जिम्मेदाराना कार्यवाही सचिव द्वारा की गई जो असहज थी। वे न्यास को विधि-विधान से चलाने में असक्षम साबित हुए हैं। 5. श्री राजगोपाल पीवी एवं श्री कुमार सिद्धार्थ के न्यासी कार्यकाल को बिना ‘न्यासी मंडल’ की सहमति के समाप्त होने की लिखित सूचना नवंबर 2022 में देकर कार्य-मुक्त मान लिया गया, जबकि न्यासियों के कार्यकाल बढाने की परम्परा रही है। इसके ठीक पहले कतिपय न्यासियों के कार्यकाल बढाए भी गए थे। 6. सचिव ने न्यास की कार्यवाही में कूट-रचित बदलाव किए हैं, जो प्रमाणित हैं, जिनका कभी कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया। यह न्यास मंडल के साथ अविश्वास की कार्यवाही है। 7. बैंक में अध्यक्ष एवं सचिव के हस्ताक्षर से खाता संचालन करने के पत्र कुछ न्यासियों से लिखवाए गए, जबकि न्यास का नियम है कि हस्ताक्षर-कर्ताओं में से एक कोषाध्यक्ष होना ही चाहिए। इस विषय में न्यासियों को पंजीकृत न्यास के प्रावधानों के बारे में नहीं बताया गया और न्यासियों समेत बेंक को गुमराह किया गया। न्यास के विधान के विपरीत कार्य था, इससे न्यासियों की प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी। 8. सचिव द्वारा खुद ही मनमाने निर्णय लिए जाते रहे हैं और उनके द्वारा ‘न्यास मंडल’ के निर्णयों की अवहेलना निरंतर की जाती रही है। अगस्त 2021 में अनीस, वंदना शिवा और राकेश दीवान का ‘न्यास मंडल’ में सर्वसम्मति से वरण किया गया। नियम के मुताबिक सचिव को इसकी सूचना वरण किए गए सदस्यों को दी जानी थी, लेकिन उन्होंने ‘न्यास मंडल’ से पूछे बिना अनीस का नाम गायब कर दिया। इसी तरह राकेश दीवान को मनमर्जी से ‘पुनर्विचार करने’ का कहकर लगभग साल भर लटकाए रखा गया। 9. सचिव के कार्यकाल में तीन कोषाध्यक्षों ने कार्य किया। 1. श्री देवेन्द्र गुप्ता - इन्होंने आर्थिक अनियमितताओं के गंभीर आरोप लिखित में लगाए हैं जिस पर कोई कार्यवाही नहीं हुई। 2. श्री श्याम बोहरे – इन्होंने सचिव जी की मनमानी और आर्थिक अनियमितताओं के कारण एक साल के अंदर ही इस्तीफा दे दिया। 3. श्री कुमार सिद्धार्थ - इन्होंने लिखित में कई प्रकार की अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। उपरोक्त पृष्ठभूमि में हमारा आग्रह है कि ‘गांधी भवन न्यास’ की बैठक (26 जुलाई 2023) के सभी फैसलों को खारिज करके आरोपों की गहराई से जांच की जाए। गांधी के नाम पर बने किसी भी संस्थान में इतनी पारदर्शिता की अपेक्षा तो की ही जा सकती है।

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