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क्या कन्या दान देने योग्य वस्तु है – गोपाल पाण्डे
कन्यादान एक ऐसा शब्द है जिससे सामान्यतः प्रतीत होता है कि कन्या एक दान देने योग्य वस्तु है। कन्या की अपनी इच्छा का स्वतन्त्रता का कोई महत्व नही। मगर यदि ध्यान से देखा जाये तो ये भी एक सामाजिक कुरीति है जिसने स्त्री की दशा को और दयनीय ही बनाया है। कन्यादान एक ऐसा शब्द है जो दर्शाता है कि स्त्री भोग की वस्तु है जो आपके प्रयोग के लिए दी जा रही है। यह तो यही बात हुई कि आपने स्त्री को भी गाय, भैंस बकरी की तरह बना दिया है जिसे जब चाहें जैसे भी प्रयोग किया जा सकता है। विवाह के मंडप में पण्डित भी सबसे कहता है कि कन्या दान महा पुण्य का कार्य है और इस तरह से कहते हुए वह अनेक लोगों से उसी एक कन्या का दान करवाता है। जैसे यह कोई कन्या नही हुई कोई दान की बछिया हुई जिसकी पूंछ पकड़ कर अनेकों लोग वैतरणी के पार हो जाते हैं। बहुत लोगों को मैंने देखा है जो बेटी की विदाई के वक्त वर से कहते हैं कि ये तुम्हारे घर की दासी है इसे अपने चरणों में जगह देना...!! आखिर ऐसा क्यों ? क्या बिगाड़ा है कन्या ने जो उसे दान किया जाए। दामाद भी तो बच्चा ही है। जैसे हमारी बेटी वैसे ही उसे भी बेटा माना जाये तो क्या कुछ फर्क आ जायेगा ? कैसे अपनी बेटी को वस्तु के समान दान कर सकते हैं। विवाह में तो बराबरी होती है दोनों पक्षों की। असल मे कन्यादान शब्द धर्माधीशों द्वारा अपनी पुरोहिताई चमकाने के लिये प्रयुक्त किया जाता है। हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों (षोडश संस्कार) का उल्लेख किया जाता है जो मानव को उसके गर्भाधान संस्कार से लेकर अन्त्येष्टि क्रिया तक किए जाते हैं। इनमें से तेरहवाँ संस्कार विवाह संस्कार है। विवाह दो शब्दों से मिलकर बना है- वि + वाह। जिसका शाब्दिक अर्थ है विशेष रूप से उत्तरदायित्व का वहन करना। और इसके लिए कन्यादान की जगह पाणिग्रहण का प्रयोग हुआ है। जिसका अर्थ है हाथ सौंपना। विवाह में वर व वधू अपने अलग अस्तित्वों को समाप्त कर, एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं और एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं एवं भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे दो पहियों की तरह प्रगति पथ पर आगे बढ़ते हैं। अर्थात विवाह दो आत्माओं का पवित्र बंधन है, जिसका उद्देश्य मात्र इंद्रिय-सुखभोग नही, बल्कि संतानोत्पादन कर एक परिवार की नींव डालना है। इस यज्ञ में जिन मंत्रो का प्रयोग होता है उनके अनुसार हाथ सौंपना से तात्पर्य है जिम्मेदारी का अहसास दिलाना है। यदि हम विवाह संस्कार में देखें तो इसमें कहीं भी कन्या को किसी वस्तु की तरह दान के रूप में सौपने या दान के रूप में ग्रहण करने का कोई उल्लेख नही है। इसीलिये आज कन्या दान के बजाय पाणिग्रहण की परम्परा को बढ़ावा दिये जाने की जरूरत है जो कि धर्मसम्मत भी है। कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि कन्यादान शब्द में आखिर आपत्ति ही क्या है। तो दान उसका दिया जाता है जो खुद के द्वारा अर्जित किया गया हो जब कि बेटी तो ईश्वर का वरदान है उसे आप भला दान कैसे दे सकते हैं। यदि आप किसी को कुछ दान देते हैं तो इसका अर्थ है कि उस वस्तु से फिर कोई सम्बन्ध ममता मोह आदि आपका नही रहेगा। जब कि कन्या सारी जिन्दगी आपसे जुड़ी रहती है। इसे आप कन्या आदान तो कह सकते हैं किन्तु कन्यादान नहीं!! विवाह संस्कार में कहीं भी कन्यादान का जिक्र नही है। जो आप फेरे के समय वचन लेते और देते हैं उसमें भी पत्नी को सहधर्मिणि ही कहा गया है। वर और कन्या जीवन साथी होते हैं कोई दान की वस्तु नही। विवाह एक यज्ञ भी है जिसमें दो परिवारों के संस्कारों का सम्मिलन करके नये उत्कृष्ट कार्य करने के लिए एक दूसरे का हाथ बटाया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य ऐसी संतान को पैदा करना जो यशस्वी शक्तिशाली ज्ञानी व कीर्तिवान हो क्यों कि ऐसे लोग ही देश समाज व परिवार का भला कर सकते हैं। संसार का भला करने के कारण ही यज्ञ को श्रेष्ठतम कर्म भी कहा गया है। 👑👑👑👑👑 गोपाल पाण्डेय 9991175224 7050615224 🙏🙏🙏🙏🙏


