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भाजपा नेताओं पर भारी दिखी अफसरशाही

 इंदौर। इंदौर में बेलेश्वर महादेव मंदिर को तोड़ने का विवाद अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि बुधवार को नगर निगम के अधिकारियों ने एक और मंदिर को अवैध निर्माण बताकर तोड़ दिया। अब इस मंदिर को लेकर राजनीति भी शुरू हो गई है। महापौर पुष्यमित्र भार्गव और एमआइसी सदस्य अभिषेक शर्मा बबलू भले ही कह रहे हों कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी और ये काम निगम अधिकारियों ने उनकी जानकारी के बगैर किया है। वैसे यह बात किसी के गले नहीं उतर रही है, पर अगर ऐसा है तो एक फिर यह साबित हो गया कि इंदौर नगर निगम में भाजपा नेताओं पर अफसरशाही हावी है। पूर्व नगर निगम आयुक्त प्रतिभा पाल और महापौर और पार्षदों की न बनने की चर्चा थी, अब वहीं हाल नई निगम आयुक्त हर्षिका सिंह के दौर में भी नजर आ रहा है।

और विजयवर्गीय ने दिखाई ‘हिम्मत’

पूर्व मंत्री दीपक जोशी के भाजपा छोड़कर कांग्रेस में जाने की धमक भोपाल से लेकर दिल्ली तक सुनाई दी। इसके बाद से पार्टी नेतृत्व डैमेज कंट्रोल में लग गया है। विधानसभा चुनाव में पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए भाजपा ने रूठों को मनाना शुरू कर दिया है। इसी सिलसिले में पिछले दिनों रतलाम में हुई भाजपा नेता हिम्मत कोठारी और राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय की मुलाकात के चर्चे भी दूर तक सुनाई दे रहे हैं। एक दूसरे के विरोधी माने जाने वाले पूर्व गृह मंत्री और विजयवर्गीय के बीच हुई मुलाकात के बाद मालवा की राजनीति में नए समीकरण बनने और विधानसभा चुनाव को लेकर चर्चाओं का बाजार भी गर्म है। इससे पहले कोठारी ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से भी मुलाकात की थी। दीपक जोशी की तरह कोठारी पार्टी नेतृत्व से नाराज थे और समय-समय पर अपने बयानों से निशाना साधते रहते थे।

झगड़ा भले ही नया है पर अदावत पुरानी है…

पिछले दिनों स्वच्छता सर्वेक्षण के मुद्दे पर महापौर द्वारा बुलाई गई बैठक के बाद नेता प्रतिपक्ष चिंटू चौकसे और अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ के प्रदेशाध्यक्ष शेख अलीम आपस में भिड़ गए थे। नौबत हाथापाई तक पहुंची तो पूर्व पार्षद दीपू यादव ने दोनों को बीचबचाव कर अलग किया। झगड़ा पार्षदों का पक्ष रखने की बात को लेकर भले ही हुआ था, पर इन नेताओं की अदावत बहुत पुरानी है। पिछली परिषद में शेख अलीम की पत्नी फौजिया अलीम नेता प्रतिपक्ष थी, इस बार भी वे दावेदार थी। जो बीचबचाव करने वाले दीपू यादव की पत्नी भी पार्षद हैं, वे भी इस पद की दावेदार थी। इन दोनों वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर पार्टी ने चिंटू चौकसे को नेता प्रतिपक्ष बना दिया। इसी बात से शेख अलीम नाराज थे, जैसे ही उन्हें मौका मिला, उन्होंने अपनी भड़ास निकाल ली। अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि ये झगड़ा भले ही नया हो, पर अदावत पुरानी है।

इसलिए यादव भी चल रहे दिग्विजय की राह पर

पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह कांग्रेस पार्टी के कद्दावर नेता माने जाते हैं। आज भी कांग्रेस में सबसे ज्यादा जनाधार उन्हीं का है, इसके बाद भी वे सार्वजनिक सभा लेने से बचते हैं। पार्टी भी चाहती है कि वे भाषण बयान न ही दें तो अच्छा है। उनके पिछले कुछ बयानों से पार्टी की भारी किरकिरी हुई थी। दिग्विजय सिंह इन दिनों आगामी विधानसभा चुनावों को लेकर काफी सक्रिय हैं। वे कार्यकर्ताओं या पार्टी नेताओं को संबोधित करने के बजाय बैठक लेने पर भरोसा कर रहे हैं। अब उन्हीं की राह पर पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अरुण यादव भी चल रहे हैं। वे इन दिनों सार्वजनिक कार्यक्रमों के बजाय छोटी-छोटी बैठकों पर जोर दे रहे हैं। इसके पीछे उनका तर्क है कि सार्वजनिक कार्यक्रम में खर्च बहुत होता है, इसकी बैठक किसी कार्यालय या निवास पर भी की जा सकती है, इसके लिए ज्यादा ताम-झाम की आवश्यकता नहीं होती है।

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