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क्या दिग्विजय सिंह कांग्रेस के कालीदास हैं?

( श्रीगोपाल गुप्ता ) क्या दिग्विजय सिंह कांग्रेस के कालीदास हैं? जो बार-बार पेढ़ की उसी डाल को काटने के लिये आतूर हैं जिस पर वे स्वयं बैठे हैं! मर्तबा दर मर्तबा वे उसी पेढ़ (कांग्रेस) की डाल को जिस पर खुद बैठें हैं,काटकर पेढ़ को तो वे नेस्ताबूद करने का कुप्रयास कर ही रहे हैं जबकि बार-बार खुद भी जमीन पर गिरकर लहूलुहान हो रहे हैं!बावजूद इसके वे बाज आने का नाम तक नहीं ले रहे हैं! ताजा मामला मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री,राज्यसभा सांसद व कांग्रेस के कद्दावर नेता श्री दिग्विजय सिंह ने राहुल गांधी द्वारा निकाली जा रही भारत जोड़ो यात्रा के दौरान अभी हाल ही में जम्मू में आयोजित जनसभा को सम्बोधित करते हुये सरकार से सर्जिकल स्ट्राइक के पुनः सबूत मांगने का है!सबूत मांग कर उन्होने देश के राजनीति क्षितिज पर हलचल पैदा कर सियासत में उबाल ला दिया है! उनके इस सबूत मांगो अभियान ने एक तरफ जहां चार महिनों से 3 हजार 500 किलोमीटर सड़कों पर चलकर पसीना बहाने वाले पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के उद्देश्य पर सवालिया निशान खड़े कर दिये हैं वहीं अपने सबसे बड़े सक्रंमण काल से गुजर रही कांग्रेस को और अधिक खाई में धकेलने का काम किया है! इससे अब यह संभावना उठ रही है कि क्या दिग्विजय सिंह कांग्रेस के कालीदास साबित हो रहे हैं? जो पेढ़(कांग्रेस) को बर्बाद करने पर तुले हुये हैं? ये सच है कि सत्तारुण भारतीय जनता पार्टी,प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी और ग्रहमंत्री अमित शाहा ने अपने 8 साल के कार्यकाल में कांग्रेस को दफनाने के प्रयासों में कोई कोताही नहीं छोड़ी है मगर दिग्विजयी बयानों से साफ है कि कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डालने का काम तो अपनों ने ही किया है!हालांकि कांग्रेस और राहुल गांधी ने तत्काल सेना के प्रति अपनी आस्था और विश्वास व्यक्त करते हुये दिग्विजय सिंह के बयान से किनारा कर लिया! मगर इसका जो खामियाजा हुआ है वह कांग्रेस का भरना तय है! दिग्विजय सिंह बेरोजगारी, महंगाई जैसे मुद्दों पर कभी अपनी जुबान नहीं खोलते। वे सरकारी संपत्तियों और सरकारी सेवाओं के धड़ल्ले से हो रहे निजीकरण को लेकर भी कभी कोई सवाल नहीं उठाते हैं। वे सरकारी बैंकों को अरबों रुपए का चूना लगा कर देश से भाग चुके बेईमान कारोबारियों के बारे में सरकार से सवाल नहीं करते हैं। आदिवासियों के उत्पीड़न पर भी वे कभी कुछ नहीं बोलते। वे आमतौर पर वही घिसे-पिटे मुद्दे उठाते रहते हैं जो भाजपा और उसके ढिंढोरची मीडिया को खूब रास आते हैं, जैसे अभी उन्होंने बिना किसी संदर्भ के सात साल पुराने सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर सवाल खड़ा कर सियासती जंग छेड़ दी जो कांग्रेस की ठीक होती सेहत बिगाड़ने के लिये काफी है!कश्मीर में अनुच्छेद 370,बाटला हाउस मुठभेढ़ का मामला,कुख्यात आंतकी ओसमा के खात्मे का विरोध करना और उसे जी कहकर संबोधित करना जैसे कई आत्मघाती बयान है जिन्होने कांग्रेस को बहुसंख्यकों से दूर जाने पर मजबूर कर दिया वहीं जिनके लिये ये बयान दिये गये वे भी आज कांग्रेस के साथ नहीं हैं!दिग्विजय सिंह गोवा सहित कई राज्यों में कांग्रेस के प्रभारी रहे और जहां-जहां भी वे प्रभारी रहे तब से अब तक कांग्रेस उस राज्य में सत्ता से काफी दूर है या फिर उसका फिलहाल सत्ता के करीब फटकना भी बर्जित हो चुका है! ये शोध का विषय हो सकता है मगर लगभग सच है कि मध्यप्रदेश में सन् 2003 में दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्रित्व में सत्ता गंवाने वाली कांग्रेस 15 साल बाद 2018 में प्रदेश की सत्ता में महज 18 महिनों के लिये सिर्फ और सिर्फ इसलिये वापिसी कर सकी क्योंकि दिग्विजय सिंह को प्रचार से दूर घर बिठा दिया था! क्योंकि प्रदेश का कर्मचारी तबका आज भी उनके कार्यकाल में अपने पर हुये जुल्मों को भूला नहीं है और दिग्विजय सिंह से आज तक भंयकर नाराज है! यही कारण है कि चुनाव के दौरान स्वयं दिग्विजय सिंह ने कहा था कि मैं चुनाव में प्रचार नहीं करुंगा क्योंकि मेरे बयानों से कांग्रेस के वोट कट जाते हैं जो सच भी है! उनके बिना किसी सन्दर्भ के दिये गये तृष्टीकरण के बयान आज देश में बहुसंख्यक बाद हावी हो जाने से निर्थक और बेकार हैं,क्योंकि तृष्टीकरण के दिन लद गये हैं! हां उनके बयान न केवल कांग्रेस समर्थक मतदाताओं को गहरी निराशा में धकेल देते हैं बल्कि कांग्रेस कार्यकर्ता भी अपने आपको कहीं न कहीं चोटिल समझने लगता है!

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