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मुरैना सफलता की कहानी हितग्राही किसान की जवानीगुगल,शताबर और औषधि पौध लगाकर कर बहुत खुश है बामसोली के किसान।
मुरैना से 90 किलोमीटर दूर के धीरेन्द्र सिंह जादौन पुत्र स्व श्री रामपाल सिंह जादौन ग्राम बामसौली तहसील सबलगढ जिला मुरैना ,मध्यप्रदेश ने असिंचित् एव्ं वंजर भूमि में सोना उगाया कहावत को चरितार्थ किया हैं उनके बताये अनुसार कि मैं ऐसी खेती करू जिसमे पानी बहुत कम लगे ,बार बार की मेहनत भी कम लगे क्योंकि मेरे खेत के पास पानी की उपलब्धता बहुत ज्यादा नही है ,साथ ही मजदूर भी आसानी से नही मिलते ।लेकिन मन मे यह भी था कि खेती फायदे का सौदा भी बने।इसी बीच इस बारे में मेरी चर्चा सुजागृति समाज सेवी संस्था के श्री ज़ाकिर हुसैन से हुई ।उन्होंने मार्ग दर्शन दिया कि यदि आप थोड़ा धैर्य रखें और मेरी बात पर भरोसा रखें तो गुग्गल और सतावर का रोपड़ अपने खेत मे कर इस जमीन के भाग्य बदल सकते हैं ।यह एक ऐसी प्रजाति है जिसे संरक्षण की जरूरत है।गुग्गल में 5,6 साल बाद गोंद आना शुरू होगा और उसकी कीमत इतनी होती है कि आपका 5 साल का इंतजार करना भी आपको फायदे का सौदा ही साबित होगा।साथ ही शतावर की फसल से 2 साल बाद ही आपको आमदनी शुरू हो जायेगी।इसके अतिरिक्त श्री ज़ाकिर हुसैन ने बताया कि गुग्गल और शतावर के बीच मे जो जगह है उसमें अश्वगंधा भी लगा ले तो उस से 6 माह में ही आपकी आमदनी शुरू हो जाएगी।उन्होंने कहा कि आपको बस थोड़ा धैर्यऔर थोड़ा विश्वास रखना होगा तथा अपने खेत की सुरक्षा के लिए फेंसिंग और निगरानी की व्यवस्था करना होगी ताकि गुग्गल,शतावर और अश्वगंधा को जंगली जानवरों के नुकसान से बचाया जा सके। श्री ज़ाकिर हुसैन ने कहा हमारी संस्था राष्ट्रीय औषध पादप बोर्ड के सहयोग से गूगल और जैव विविधता संरक्षण आजीविका परियोजना के तहत आप के खेत में गूगल सताबर लगाने हेतु उन्होंने बताया कि ये सब पौधे हम उपलब्ध कराएंगे और इन से होने वाले उत्पादों के विक्रय में भी सहयोग करेंगे।ये विचार धीरेंद् सिंह को पसंद आया और उन्होंने अपने ग्राम बामसौली के बालाजी मंदिर के पास अपनी एक हेक्टेयर जमीन में गुग्गल लगाने का निर्णय जून 2021 में लिया। उसके बाद मई 2021में शतावर और नवंबर 2021 में अश्वगंधा भी लगाई।इनके लगाने के बाद मात्र एक बार पानी दिया ,उसके बाद से ये सब पौधे आज निकल आये है तथा अच्छी स्थिति में है .इस कम पानी वाले इलाके में आसपास के बहुत सारे किसान औषधीय खेती करने के लिए लालाइत है तथा संपर्क बनाए हुए हैं निश्चित रूप से इसका सकारात्मक परिणाम देख कर औषधीय पौधों की खेती करेंगे जिससे लुप्त होती हुई प्रजाति तो बचेगी ही साथ ही साथ कंपनियों की डिमांड भी पूरी होगी तथा किसानों की आय तीन से चार गुनी बढ़ जाएगी क्योंकि आज के समय में गूगल गौद का भाव ₹2000 / ,शतावर ₹300 किलो ,अश्वगंधा की जड़ ₹700 किलो चल रहा है 10,00000 / की आय होगी साथ ही साथ पर्यावरणीय लाभ होगा क्योंकि यह फसल में जैविक तरीके से पैदा की जा रही हैं जिससे खेत में कीटनाशक दवा व रासायनिक खाद डालने की जरूरत नहीं पड़ेगी जिससे जमीन भी अच्छी रहेगी धीरेंद्र सिंह की सफलता मै सुजागृति समाज सेवी संस्था मुरेना, राष्ट्रीय पादप बोर्ड ,आयूष मंत्रालय भारत सरकार तथा तकनीकी सहयोग के लिए आर सी एफ सी जबलपुर का महत्त्व पूर्ण सहयोग व मार्गदर्शन रहा.



