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समय ना भी मिले तो भी कर लिया करो बात हर किसी के नसीब में नहीं होती है अगली मुलाकात ।

रंग बदलती जिन्दगी में हर लम्हा तन्हा होने का एहसास दिलाता है! जीवन के सफर को तमाम विसंगतियों के शानिध्य में अनुभूतियों के समर्पण के साथ शनै: शनै: कभी दुख: कभी सुख के साथ पूरा करने का लक्ष्य निर्धारित कर दिए हैं विधाता!भाग्य और दुर्भाग्य के झन्झावाती आवरवण में हर पल को कल बल छल के साथ ज़िन्दगी में उत्कर्ष से लेकर आखरी सफर के तरफ बढ़ते हर वर्ष को समर्पित कर दिया है।महज चन्द लम्हों का सफर इरादे आसमानी! ख्वाब मनमानी! सोच का समन्दर हर वक्त सुखद भविष्य के लिए उफान पर जब की वर्तमान में हर तरफ सिर्फ तबाही का तूफान! गजब का मंजर है हर कोई सिकन्दर है!समय तेजी से बदल रहा है! चन्द लम्हों का भरोसा नहीं आदमी सौ साल के इन्त जाम में सारा वक्त लगाकर आशक्ति के भंवर जाल में फंसकर विरक्ति के राह पर अनायास ही बढ़ जाता है। सब कुछ तेजी से बदल रहा है।तरक्की सुदा इस ज़माने में पुरातन सभ्यता गौड़ हो गई! आधुनिकता के आडम्बर में स्वयम्बर की परम्परा ने दिशाहीन होती आधुनिक पीढ़ी को आधुनिकता का प्रमाणित प्रमाण बना दिया है। पाश्चात्य सभ्यता ने परिवार की समरूपता, एकता, अखंडता, को विषमता की चासनी में इस कदर डूबो दिया है कि एक दुसरे को नीचा करने में ही दिन गुजर रहे हैं।जगत नियन्ता के इस माया लोक में परलोक जाने से घबराते लोग अब उस शक्ति को भी नकारने लगे हैं जिसके इशारे पर कालचक्र संसार को नियंत्रित करता है।आधुनिक होता मानव समाज आज जिस राह पर चल निकला है वह पुरातन सभ्यता के संस्कारिक धरातल को रौंद कर तरक्की की ईबारत लिख रहा है।जरा गौर करें भारत की पुरातन परम्परा, भारतीय सभ्यता आपसी सामंजस्य आपसी लगाव आपसी भेदभाव कभी कितना पारदर्शी हुआ करता था! लोगों का स्वभाव समदर्शी हुआ करता था! हर कोई दुख सुख में सहभागी रहता था! गांव हो या शहर सबमें लाज लिहाज बड़े छोटे का रिवाज कायम था! हर तरफ खुशहाली थी! चारों तरफ हरियाली थी!मगर अब तो बहुत कुछ बदल गया है।अब फैसन के नाम पर फूहडपना तरक्की के नाम नंगापन परिवार के नाम पर विघटन तथा संस्कार के नाम पर अपनों का तिरस्कार आज के जमाने का फार्मूला बन गया है।इस भाग दौड़ की ज़िन्दगी में सादगी से लोगों का रिश्ता खत्म होता जा रहा है!आवारगी का प्रचलन बढ़ता जा रहा है! ब्यस्त ज़िन्दगी में किसी की बन्दगी की फुर्सत नहीं ऐसा दौर चल रहा है जरुरत भर साथ फिर मुलाकात के लिए लोग तरह जा रहे हैं!आज अपने अपनों के बीच अकेला है!जीवन भर का झमेलाआखरी सफर के झंझावाती राह में अथाह दर्द के साथ कर रहा है तिरस्कार का खेला! गजब का मंजर है! किसी का कोई नहीं रहबर है!।दुराव टकराव का बीज अंकुरित हो गया घर घर है! वास्तविकता के धरातल पर कदम ताल करती ब्यवस्था आस्था के किनारे पहुंच कर दम तोड रही है! क्या जमाना आ गया है दोस्तों! समय का खूबसूरत किरदार जीवन में बड़ी मुश्किल से मिलता है! मानव जीवन का अनमोल लम्हा फिर कभी नसीब हो न हो जब तक जिन्दगी है अपनों से बात कर लिया करो!लाख मजबूरी हो तब भी जरूरी है! अगली मुलाकात नसीब में है की नहीं कौन जानता है।हर लम्हा मालिक की रहमत के साथ इस मिट्टी की काया में माया का प्रतिरूप बनकर आता जाता है! विधाता के रहमो करम पर ही हर सांस विश्वास की बैसाखी पर सफर तय करती है।मौत मुस्कराते गुजरते लम्हों की गणना मे ब्यस्त है?कब जीवन का सूरज अस्त हो जाए कौन जानता है! जब तक रहे इन्सानियत को जिन्दा रखे! गरीब असहाय लाचार को प्यार मुहब्बत का पैगाम दे रहमतों की वर्षांत होती रहेगी! ज़िन्दगी मुस्कुराती रहेगी!

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