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उत्तरप्रदेश

डीटीओ सहित डेढ़ दर्ज स्टाफ हैं, 2169 मरीजों के लक्ष्य के बदले 1860 मरीजों के इलाज का दावा

कौशांबी: कौशांबी में जिला क्षय रोग अस्पताल में मरीजों का इलाज महज फार्मासिस्ट के भरोसे होता है। जबकि करोड़ों की लागत से बने अस्पताल में डीटीओ सहित डेढ़ दर्जन स्टाफ की तैनाती की गई है। अस्पताल में मरीजों के इलाज के लिए एक्सरे मशीन से लेकर टूनाट एवं सीबीनॉट की जांच की सुविधा मुहैया कराई गई है। बावजूद इसके अस्पताल में डीटीओ सहित अन्य कर्मचारी दफ्तर से नदारत रहते हैं। महज फार्मासिस्ट अस्पताल आने वाले मरीजों को दवा देकर घर भेज रहे हैं।आठ साल पहले टीबी अस्पताल का हुआ निर्माणटीबी यानी ट्यूबर क्लोसिस की बीमारी से निपटने के लिए सरकार ने साल 2014 में करोड़ों रुपये की लागत से टीबी अस्पताल का निर्माण सीएमओ ऑफिस से कुछ दूर कराया। अस्पताल में मरीजों को बेहतर इलाज की व्यवस्था के लिए जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. सनद कुमार झा को नियुक्त किया।जिसके सहयोग के लिए मेडिकल अफसर डॉ. अर्चना यादव, डीपीसी अभिषेक तिवारी, डीपीटीसी पंकज सिंह, एकाउंटेंट अजय कुमार,एसटीएस विनीत सिंह, एसएम अयोध्या सिंह, सीबीनाट एलटी अनुराज सिंह,एक्सरे टेक्नीशियन प्रमोद कुमार, डाटा इंट्री आपरेटर कुंवर सिंह, समेत नागेंद्र कुमार, वीरेंद कुमार, चौधरी, सोमचन्द्र को बतौर चौकीदार नियुक्त किया गया।दवाएं भी बाहर की लिखी जा रही हैंबताया जा रहा है कि अस्पताल में इतने भारी भरकम इंतजामात के लिए लाखों रुपये हर माह वेतन भत्ते पर सरकार खर्च करती है। बावजूद इसके टीबी अस्पताल में फार्मासिस्ट एवं नमूना जांच कर्मचारियों के अलावा कोई अफसर कर्मचारी दफ्तर में नहीं बैठते। नतीजतन अस्पताल में इलाज के लिए आने वाले टीबी मरीज को कागजी कोरम पूरा कर फार्मासिस्ट दवाओं की गोलियां पकड़ाकर घर भेज देता है।डाटा सेंटर के जरिए कराया जा रहा इलाजस्वास्थ्य महकमे के आंकड़ों में मौजूदा साल में 1860 टीबी मरीजों को विभाग के चिह्नित कर इलाज करा रहा है, जबकि शासन ने 2169 मरीजों को खोजकर इलाज करने का लक्ष्य निर्धारित किया था। टीबी मरीजों के इलाज और उनके ठीक होने के अनुपात का पता लगाने के लिए जिओ टैगिंग 1860 मरीजों की गई है। टीबी की दवाओं के रिजेक्शन से 22 मरीज सामने आए हैं। जिनका इलाज डाट सेंटर के जरिए कराया जा रहा है।मरीजों के जांच के लिए 9 यूनिट काम करती हैजनपद स्तर पर टीबी मरीजों की जांच एवं पहचान के लिए 9 यूनिट काम करती है। जिसमें डीएमसी की 16 यूनिट अलग से संचालित है। इसके अलावा विभाग ने गांव गांव जाकर टीबी के मरीज जांच के लिए एक मोबाइल वैन भी मुहैया कराई है। जो अस्पताल परिसर में खड़ी कर छोड़ दी गई है। अस्पताल कर्मियों के मुताबिक, महीनों से अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस वैन अपने स्थान से कही नहीं ले जाई गई।सीएमओ बोले- निरीक्षण कर जांच की जाएगीसीएमओ डॉ. सुस्पेंद्र सिंह ने बताया, टीबी अस्पताल में प्रभारी एवं अन्य कर्मचारियों के अस्पताल में न बैठने की शिकायत उन्हें नहीं मिली है। औचक निरीक्षण का व्यवस्था की पड़ताल की जाएगी। टीबी मरीजों के इलाज में किसी तरह की लापरवाही नहीं की जा रही है। इसकी समीक्षा समय समय पर की जाती है। शासन से निर्धारित टारगेट के सापेक्ष केवल 309 मरीज अभी चिह्नित नहीं हो सके है।

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