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मध्यप्रदेश

गुरु बिन कुछ नहीं बन पाते हम गुड़ के गुड़ रह जाते

हर्षल सिंह राठौड़, इंदौर। वेदों में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु, महेश यहां तक कि परब्रह्म की संज्ञा दी गई है। ऐसा इसलिए क्योंकि शिक्षक केवल किताबी शिक्षा ही देते बल्कि जीवन जीने का सलीका भी सिखाते हैं। शिक्षक केवल वही नहीं, जो किताबों में दर्ज अक्षरों का ज्ञान देते हुए परीक्षा में बेहतर अंक दिला सके, अपितु शिक्षक तो वह है, जो जीवन की परीक्षा में शामिल होकर आगे बढ़ने का हौंसला दे सके।

कापी में लिखे जाने वाले उत्तर को सही-गलत ठहराने के अलावा शिक्षक जीवन पथ के कर्तव्यों में भी सही-गलत का भेद करना सिखाता है। शिक्षक वह है, जो लक्ष्य निर्धारित करने की सलाह देता है। जो अभिभावक के साथ न होने पर उनकी कमी नहीं खलने देता। जो सफलता का मंत्र बताते हुए अपने शिष्य को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाता है।

आज हम ऐसे ही शिक्षकों को उन्हीं के शिष्यों के माध्यम से आपसे मिलवा रहे हैं, जिन्होंने अपना दायरा केवल स्कूल, कोचिंग या सिलेबस तक ही सीमित नहीं रखा बल्कि उस सीमा से परे जाकर विद्यार्थियों के जीवन को संवारने पर केंद्रित किया।

सपनों को मिला आत्मविश्वास

आज मैं जिस मुकाम पर हूं, उसके पीछे मेरे प्रत्येक शिक्षक की महती भूमिका रही फिर चाहे प्राथमिक शिक्षा देने वाले शिक्षक हों या कालेज में पढ़ाने वाले। मुझे याद है, जब मैं हाइस्कूल का विद्यार्थी था, तब रामकृष्ण मिशन विद्यालय में पढ़ता था। वहां मेरे शिक्षक गणपति महाराज ने मुझे न केवल किताबी ज्ञान दिया बल्कि भावनात्मक रूप से भी साथ दिया व प्रोत्साहित किया। जब मैं कालेज में था, तब मेरे सर प्रो. मिनाक्षी सुंदरम् ने हम विद्यार्थियों से कहा कि आप जो बनना चाहते हैं, वह एक कागज पर लिखकर मुझे दे दें और जब बन जाएं तो मेरे पास आएं। उनके कहने से मैंने भी आइएएस अधिकारी बनने की बात लिख दी और तैयारियों में जुट गया। बहुत बाद में इस बात का अहसास हुआ कि सर के उस प्रयास से हम विद्यार्थियों के मन में एक लक्ष्य तय हो गया था। फिर उनकी दिखाई राह पर हम परिश्रम करते गए और मन आत्मविश्वास से भरता गया। अंतत: मैं अपने सपने को साकार कर पाया।

– इलैया राजा टी, कलेक्टर, इंदौर

मुझे ही नहीं, माता-पिता को भी किया प्रोत्साहित

लक्ष्य निर्धारण क्या होता है और जीवन में उसका क्या महत्व है, यह बात मुझे डा. पीएस ठाकुर सर ने तब सिखाई थी, जब मैं कक्षा आठवीं में था। उन्होंने महा-धनुर्धर अर्जुन के लक्ष्य साधने वाली कहानी कुछ इस तरह सुनाई व समझाई कि मैं लक्ष्य निर्धारित करना सीख गया। धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ता गया और सफलता मिलती गई। मेरी खूबी को मेरे एक अन्य शिक्षक सुशील पांडे सर ने पहचाना। उन्होंने मुझसे जब कहा कि तुम प्रशासनिक अधिकारी बन सकते हो, तो मुझे स्वयं पर विश्वास नहीं हुआ। इस पर उन्होंने न केवल मुझे प्रोत्साहित किया बल्कि मेरे माता-पिता को भी प्रोत्साहित किया। उन्होंने केवल किताबी ज्ञान देने तक ही अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई बल्कि शिष्य के गुणों को पहचाना और हमारे सपनों को पूरा करने में मदद भी की। आज मैं जो कुछ भी हूं, इन दोनों शिक्षकों की वजह से हूं।

– राजेश राठौर, कार्यकारी संचालक, मप्र औद्योगिक विकास निगम

शिक्षक ही बन गए स्थानीय अभिभावक

मैं चिकित्सक बनूं, यह आदेश बेशक मेरे पिताजी का था, लेकिन मैं इसे पूरा तो अपने शिक्षकों की वजह से ही कर सका। जब मैं भोपाल में रहकर एमडी कर रहा था, तब मेरी माताजी की तबीयत बहुत खराब हो गई। उन्हें कई दिनों तक अस्पताल में दाखिल करके भी रखना पड़ा। अन्य परेशानियां भी मुझ पर हावी हो रही थीं। ऐसे वक्त में मेरे शिक्षक डा. बीपी दुबे सर ने मेरा साथ दिया। उस वक्त वे मेरे शिक्षक होने के साथ स्थानीय अभिभावक भी बन गए और मुझे भावनात्मक सहयोग दिया। उन्होंने मुझे सिखाया कि जीवन में कठिन परिस्थितियां तो आती ही रहती हैं, मगर हमें उनसे घबराना या निराश नहीं होना चाहिए। उनकी यह सीख जीवन में आज भी कारगर साबित हो रही है। आज भी जब मन घबराता है या कोई मुश्किल सामने आती है, तो उनकी सीख मुझे याद आ जाती है।

– डा. पीएस ठाकुर, अधीक्षक, एमवाय अस्पताल

उनकी सीख आज भी काम आ रही

यूं तो मुझे अपने अब तक के जीवन में हर शिक्षक से बहुत कुछ सीखने को मिला, लेकिन जब मैं कालेज का विद्यार्थी था, तब डा. ज्योति शर्मा और डा. यामिनी करमरकर मैडम ने पढ़ाई के साथ-साथ सफलता के जो मंत्र सिखाए, वे हर पल काम आ रहे हैं। किताबी ज्ञान को वास्तविक जीवन में कैसे अपनाया जाए, यह बात तो उन्होंने सिखाई ही, साथ ही किताबी ज्ञान के अलावा भी व्यापार में कैसे कामयाबी प्राप्त की जाए, इसके गुर भी उन्होंने बताए। डा. ज्योति ने एचआर और डा. यामिनी ने मार्केटिंग से जुड़ी जानकारियां दीं और साथ ही साथ प्रायोगिक रूप से आगे बढ़ना भी बताया। कंपनी तो और भी लोग शुरू करते हैं, लेकिन सफलता के लिए जरूरी है कि कर्मचारियों के साथ किस तरह का व्यवहार किया जाए, पूरी टीम को किस तरह से खुश रखा जाए। यह व्यवहार, यह हुनर इन शिक्षकों ने ही सिखाया।

– सावन लड्ढा, संस्थापक, वर्की

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