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छत्तीसगढ़

अरपा की आत्मा कब की खत्म हो चुकी, अब तो बस इसका शरीर बचा लें

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ के दूसरे बड़े शहर यानी बिलासपुर के बीच से नदी गुजरी है- अरपा। बीते वर्षों में होना कुछ ऐसा था कि इस नदी की सुंदरता निहारते ही बनती। लेकिन हो रहा है इसके ठीक उलट। दिन-रात नदी रेत के लिए छलनी की जा रही है। जमीन के लालची लोगों ने नदी की भी सीमाएं लांघ दी। शहर का सारा गंदा पानी इसी में समा रहा है। हां, इसे बचाने के लिए बातें खूब होती रही हैं। आज नहीं, दशकों से।अरपा से रेत के रूप में तो कभी इसे बचाने के नाम पर अरबों रुपए निकाले या खर्चे जा चुके हैं। पहली बार प्राधिकरण बना तब खूब दावे किए गए, लेकिन काम के नाम पर कुछ न हुआ। प्रोजेक्ट के नाम पर सैकड़ों लोगों की जमीन तकरीबन बंधक जरूर बना ली गई है। ऐसे लोग आज भी जमीन बेचने या कोई निर्माण करने के लिए मंजूरी की अर्जियां लेकर घूमते देखे जा सकते हैं। यह तो तय है कि अगर नदी को बचाना है तो शहर के जिम्मेदारों को इच्छाशक्ति दिखानी होगी।चंद रोज पहले खनिज विभाग ने एक आदेश जारी किया कि अरपा को बचाने के लिए शहर से तुर्काडीह तक पांच रेत घाट इस बार नीलाम नहीं किए जाएंगे। विभाग का यह फैसला तब आया है, जब अरपा को बचाने के लिए वर्षों से हाईकोर्ट में याचिका पर सुनवाई चल रही है। न्यायमित्र बनाए गए। टीम बनाई गई। टीम ने कई दफे नदी और इसके उद्गम का दौरा भी कर लिया। यह मजाक ही होगा कि विभाग रेत निकालकर नदी को छलनी करने वालों नहीं रोक सका और अब नीलामी बंद करने का फैसला लेना पड़ा। रेत निकालने के फेर में नदी को नुकसान एकाएक शुरू नहीं हुआ है।नदी के तटों का क्षरण हो या तुर्काडीह ब्रिज की बुनियाद हिलना, यह सब वर्षों से रेत माफियाओं की वजह से ही होता आ रहा है। तटों के कटाव को देखते हुए अप्रैल 2009 में तत्कालीन कलेक्टर ने एक भारी-भरकम गाइड लाइन जारी की थी। तब भी रेत की खुदाई से लेकर प्रदूषण और अरपा में गंदा पानी जाने से रोकने के लिए तमाम नियम बनाए गए थे। इनमें से एक भी नियम पर अगर सख्ती से अमल किया गया होता तो अरपा आज इस स्थिति में न होती। तीन माह पहले रतनपुर रोड में नदी का कटाव एनएच की सड़क आ पहुंचा और सड़क का एक हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया। जिम्मेदारों के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए।खासकर उन लोगों के लिए, जो नदी की कीमत पर रेत माफियाओं को लगातार बचाते आ रहे हैं। वैसे भी वाटर क्वॉलिटी इन्डेक्स में यह सामने आ चुका है कि अरपा का पानी कहीं भी इस्तेमाल के लायक नहीं रह गया है। उद्गम को लेकर पहले ही विवाद चल रहा है। नदी तो लगभग खत्म हो चुकी है, अब इसके शरीर यानी संरचना को बचा लिया जाए तो बड़ी बात होगी। एक बार फिर अरपा के संरक्षण-संवर्धन के लिए बड़े प्रोजेक्ट पर काम जारी है। इसके लिए अरपा बेसिन विकास प्राधिकरण बना है। इस बार प्रोजेक्ट की सफलता की उम्मीद इसलिए कई गुना बढ़ जाती है, क्योंकि इस प्राधिकरण के अध्यक्ष कोई अफसर नहीं, बल्कि खुद मुख्यमंत्री होंगे।

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