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..सिध्दान्त और अपवाद…

…सिध्दान्त और अपवाद…
प्रकृति का अटल सिद्धांत है जो एक बार ब्रह्मा ने जिसके भाग्य में लिख दिया वह उस को भोगना ही पड़ेगा उसको देव दानव मानव ऋषि मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते.
कह  मुनीश हिमवंत सुनु,जो विधि सिखा लिलार.
देव दनुज नर नाग मुनि,कोऊ न मेटनहार.
कहत कबीर सुनो भई साधो,जो विधिना लिख दई अंक.
राई घटे न तिल बढ़े,रह रे जीव निशंक.
किंतु अपवाद है कोई भी मानव यदि तीव्र भक्ति अथवा कठोर तप करता हैं तो वह अपने भाग्य की बुरी रेखाएं भी मिटा सकता है बदल सकता है अपने भाग्य को.
मंत्र महामणि विषय ब्याल के,मेटत कठिन कुअंक भाल के.
तदपि एक मैं कहहुं उपाई,होई दैव जे करइ सहाई.
जौं तप करइ कुमारि तुम्हारी,भाविहुं मेट सकई त्रिपुरारी.
अर्थात जो मानव भोगादिक विषयों से अलग होकर श्री सीतारामजी के चरण कमलों की तीव्र भक्ति में लग जाता है कठोर तप करने लगता है तो वह अपने भाग्य में लिखे हुए ब्रह्मा के द्वारा बड़ी से बड़ी बुराइयों को भी टाल देता है मिटा देता है श्री रघुनाथ जी की कृपा से उसका जीवन परमानंद में हो जाता है.
लेकिन किसी के कर्म से किसी का कोई साझा नहीं है चाहे बाप-बेटा हो चाहे गुरु शिष्य हो चाहे पति पत्नी हो चाहे कितना भी घनिष्ठ रिश्ता क्यों ना हो.
जो करेगा उसी को मिलेगा अब वह अधिकारी बन जाता है किसी को भी कुछ भी दे सकता है किंतु जो करेगा उस को मिलेगा वह चाहे किसी को दे अथवा ना दे.
संतों की भक्तों की ब्राह्मणों की छोटी-छोटी सेवा करके मानव बड़े से बड़े को अंकों को टाल देता है भक्त संत ब्राह्मण दयालु होते हैं वह छोटी मोटी सेवा से ही जीव पर प्रसन्न होकर उसके भाग्य को बदल सकते हैं.
जय श्री सीताराम।।
जय श्री राधे श्याम।।
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